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Muhurta Cintamani · Chapter 1

57
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1
श्रीपार्वतीजी के कान में स्थित केतकी के फूल के दल को सूंड़ से लेकर ओष्ठ पर धरते समय मुहृत्तंभर दूसरे
2
अनन्त दंवज्ञ के पुत्र राम मुह॒त्तंचिन्तामणि नाम ग्रन्थ की रचना करते हैं । यह ग्रन्थ जातकर्म आदि अनेक
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अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, सर्प, कात्तिकेय, सूर्य, शिव, दुर्गा, यम, विश्वेदेव, हरि, कामदेव, शिव
4
नन्‍्दा, भद्रा, जया, रिक्‍ता, पूर्णा-ये प्रतिपदा से पठ्चमी पर्यन्त, षष्ठी से दशमी पर्यन्त और एकादशी
5
सुर्यादि वारों में निषिद्ध तिथि और निषिद्ध नक्षत्र नन्‍्दा भद्रा नन्दिकाख्या जया च रिक्ताभद्रापुणसंज
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अधमं तिथियाँ और दंतुन करने का निषेध षष्ठ्यादितिथयो मन्दाद्विलोम॑ प्रतिपद्बुध । सप्तम्यक धमाः षष्ठ्य
7
छठि, अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस--इन तिथियों में क्रम से पुरुष तेल, मांस, क्षौर, रति इन कर्मों को न करे,
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अन्वयः--सूर्यादिवारे (क्रमेण) सूर्यशपञ्चाग्निरसाष्टनन्दाः, वेदाज्भसप्ताश्वि- गजाडूशेला:, सूर्याज्ज्स
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भादों महीने में प्रतिपदा और दुइज, श्रावण में दुइ्ज और तीज, वैशाख में द्वादशी, पौष में चौथि और पञ्चमी
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द्वादशी तिथि में आइलेषा, प्रतिपदा में उत्तराषाढ़, द्वितीया में अनुराधा, पञ्चमी में मघा ये शुभ कार्य
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तृतीया में तीनों उत्तरा अर्थात्‌ उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, एकादशी में रोहिणी निन्दि
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स्वातीचित्रे त्रयोदश्यां सप्तम्यां हस्तराक्षसे । नवम्यां कृत्तिका5ष्टम्यां पुृभा षष्ठयां चरोहिणी ॥ १
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चैत्र मेंरोहिणी और अश्विनी, वैशाख में चित्रा और स्वाती, ज्येष्ठ में उत्तराषाढ़ और पुष्य, आषाढ़ में प
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चित्राद्दशौं शिवाहइव्यर्का: श्रुतिसुले यमेन्द्रभे। चेत्रादिमासे शन्‍्याख्यास्तारा वित्तविनाशकाः॥ १५४
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चेत्रादि मासों में शून्य राशियाँ घटो झषो गौसिथुनं मेषकन्याईलितोलिनः । धनुः कर्को मृगः सिहरुचत्रादों
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प्रतिपदादि विषम तिथियों में दग्ध लग्नें पक्षादितस्त्वोजतिथौ धर्टणों मृगेन्द्रनक्नो मिथुनाडुने च। चाप
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अन्वयः--मासशन्‍्या: तिथयः अपि च (पुनः) यानि शून्यलग्नानि (तानि) मध्यदेश विवर्ज्यानि, इतरेष (देवेष )
19
अन्वयः--पडबग्वन्धकाणलग्नानि, मासशन्‍्या: राशयश्च गौडमालवयो: (देशयो:) त्याज्या:, अन्यदेशें न गहिता: ॥
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दभ कर्मों में निषिद्ध योग वर्जयेत्सवंकायंघष हस्ताक॑ पत्चमीतिथों। भौमाश्विनीं च सप्तम्यां षष्ठद्यां च
21
अन्वयः--अष्टम्या बुधानु्राधां, दशम्यां भग्रेव्ती, नवम्यां गुरुपुष्यं, एकादश्यां शनिरोहिणीं च संबकार्
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अन्वयः--गृहप्रवेशे, यात्रायां, च (पुनः) विवाहे, यथाक्रम॑ भौमेउश्विनीं, ब्राह्मं, ग्रो पुष्यं, विवर्ज
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अन्वयः--आ नन्दाख्य:, कालदएण (पुनः) धूम्रः, धाता, सौम्य:, ध्वांक्षकेतू श्रीवत्साख्यय, वज्रक॑ च मुद्गर
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उत्पातमृत्यू किल काणसिद्धी शुभो5म्ृताख्यों सुसलं गदइच । मातड्भरक्षशचरसुस्थिराख्यप्रवद्धमाना: फलदाः स
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इन योगों के जानने का उपाय दास्रादक मृगादिन्दा सार्पाद्भोमे करादबुंधे। मैत्रादगुरो भगो वेश्वाद्‌्गण्
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दुष्टयोगों का परिहार ध्वांक्षे बच्चे मुद्गरे चेषुनाड्‌यो वर्ज्या वेदा: पदमलुम्बे गदेइवाः । धम्रे का
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सम्पूर्ण दोषों कानाशक रवियोग सूर्य भाद्देदगोतक दिग्विशवनखसंमिते । चन्द्रक्षे रवियोगाः स्युदोषसंघविना
28
रविवार को हस्त, मूल, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, पुष्य, अश्विनी; सोमवार को श्रवण, रोह
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जीवेःन्त्यमैत्राइव्यदितीज्यधिष्ण्यं शक्रन्त्यमैत्राइव्यदितिश्रवोभम्‌। दानौ श्रुतिब्राह्मममीरभानि सर्
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रविवारादि सात दिनों में क्रम से विशाखा, पूर्वाषाढ़, धनिष्ठा, रेवती, रोहिणी, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी इन
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हणवद्भूखशेष्वेव अन्वयः--तिथिवारोत्था:, तिथिभोत्थाट, भवारजाः, तथा त्रवितयजा:, कुयोगाः हणवंगखशेष्‌. (द
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चन्द्रमा, सूये, मंगल, शनैरचर, राहु और केतु से युक्त लग्न, और नवांश; आधी रात और मध्यांक्न में बीस-बीस
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सु्यं और चन्द्रग्रहण के त्याज्य नक्षत्र ओर दिन नेष्ट ग्रहर्ष सकलाउंपादग्रासे क्रमात्तकंग्ुणन्दुमासा
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॥। अन्वयः--जन्मक्षेमासतिथय:. (वर्ज्या:), . व्यतिपातभद्रावधुत्यमापितृदिनानि (वर्ज्यानि), तिथिक्षयर्धी
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अन्वयः--विष्कुम्भवज्भघटिकात्रयं एव वज्यंम्‌ । सर्वेषु कर्मसु परिघार्ध॑(वर्ज्यम्‌), शूले पञच, गण्डाति
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पक्षरन्थ्रतिथि और उनका परिहार बेदाड्भराष्टनवाकन्द्रपक्षरन्थ्रतिथौ त्यजेत्‌ । वस्वड्भमनुतत्त्वाशा
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कुलिक आदि दुष्ट मुहत्तं कुलिकः कालवेला च यमघण्टइच कण्टकः । वारादद्विघ्ने ऋरमान्मन्दे बुधे जीवे कुज
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अन्वयः--सूर्ये, षट्‌स्वरनागदिड्मनुमिताः, चन्द्रे5व्थिषट्कूड्जराड्धार्का विश्व- पुरन्दरा:, क्षितिसुते
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अन्वयः-- मन्‌मिता . च शनौ शशिद्विनागां दिशा भवदिवाकरसंमिता च कलांशाः (मुहूर्ता:) ॥। ३८-३४ क्षण: स्या
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देशभेद से होलाष्टक का निषेध विपाशेरावतीतीरे शतद्गवाइच त्रिपुष्करे । विवाहादिशभ नेष्टं होलिकाप्राग्द
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केचिय्यामोत्तरं चान्ये यात्रायामेव निन्दितान्‌ अन्बयः--इन्दौ शस्ते मृत्युक्रकचदग्धादीन्‌ (योगान्‌ )
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यदि क्रकचादि कोई दृष्टपोग हो और उसी काल में कोई सिद्धादि शुभ योग भी हो तो वह शुभ योग उस क्रकचादि के
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भद्राकाल क्‍ शुकक्‍्ले पूर्वाद्धंषष्टमीपड्चदव्योभंद्रेकाददयां चतुर्थ्या पराद्धें । कृष्णेबन्त्याद्वे
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अन्वयः--पउचढ्धचद्रिकृताष्टराम रसभूयामादिघंट्य: शराः विष्टे: आस्य॑ (प्रोक्तं तत्‌) असत्‌ | गजेन्दुरसर
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यदि चन्द्रमा कुम्भ, मीन, कर्क वा सिंह में हो तो भद्रा मृत्यलोक में, मेष, बुष, मिथुन वा वृश्चिक में ह
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बावली, बगीचा, तड़ाग, कप और गृह के बनाने का प्रारम्भ और स्थापना (गृहप्रवेश ); किसी ब्रत का आरम्भ वा उ
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अन्वयः--इज्यसितयो: ब॒द्धत्वास्तशिशुत्वे (तथा) न्यूनाधिमासे कक कपभवनारम्भप्रतिष्ठ, ब्रतारम्भोत्सगवधूप
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अन्वयः--अस्ते वर्ज्य (कर्म) सिहनक्रस्थजीव5पि वज्येम्‌ । केचित्‌ [आचार्या: | वक्रगे च (तथा) अतिचारे [
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सिहस्थ बृहस्पतिदोष का परिहार --कै- सिंहे गुरो सिहलवे विवाहों नेष्टो$थ गोदोत्तरतरइच यावत्‌ । भागीरथ
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मघा नक्षत्र के प्रथम चरण से लेकर पूर्वाफाल्गुनी के प्रथमचरणपयेनन्‍्त पाँच चरणों में बृहस्पति सब देशो
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अन्वयः--मेषे5क गंगागोदान्तरे5पि सद्व्नतोद्ाहौ (भवेताम्‌)। कलिगे गौडगजरे (देशे) सर्व: सिहंगुरु: वर्ज्
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मकर में स्थित बृहस्पति के परिहार रेवापूर्षे गण्डकीपश्चिमे च शोणस्योदग्दक्षिणं नीच इज्यः । वर्ज्यों
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लुप्तसंवत्सर दोष और उसका परिहार रगो नो पूव्व॑राशि गुरुरेति वक्तितः । गोजान्त्यकुम्भेतरभेइतिचा तदा वि
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होरासिद्धि के लिये वारप्रवृत्ति पादोनरेखापरपूर्वयो जन: पलेयूतोनास्तिययो दिनार्धतः । ऊनाधिकास्तहिवरो-
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कालहोरा वारादेघंटिका दिध्नाः स्वाक्षहच्छंषर्बाजता: । संकास्तष्टा नगेः कालहोरेशा दिनपात्‌ क्रमात्
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कालहोरा का प्रयोजन बारे प्रोक्तं कालहोरासु तस्य छिष्ण्ये प्रोक्त स्वामितिथ्यंशके5स्य । कुर्याहिक्श
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बाहुलराधयोम॑दनदर्शों गोपनी. इति मुहत्तचिन्तामणों शुभाशुभप्रकरणं समाप्तम्‌ ॥ ११ चैत्र में तीन तिथिया