Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 1 · · Verse 4
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

नन्‍्दा, भद्रा, जया, रिक्‍ता, पूर्णा-ये प्रतिपदा से पठ्चमी पर्यन्त, षष्ठी से दशमी पर्यन्त और एकादशी से पूर्णमासी पर्यन्त तिथियों की संज्ञा हैं, अर्थात्‌ प्रेतिपदा, षष्ठी, एकादशी--इनकी नन्‍दा संज्ञा; द्वितीया, सप्तमी, द्वादइशी--इनकी भद्रा संज्ञा; तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी--इनकी जया संज्ञा; चतुर्थी, नवमी, चतुर्दंशी--इनकी रिकक्‍ता संज्ञा और पञ्चमी, दशमी, पूर्णमासी और अमावस--इनकी पूर्णा संज्ञा है। ये तिथियाँ क्रम से शुक्लपक्ष में अच्छे कार्य केलिए अधम, मध्यम, उत्तम और क्ृष्णपक्ष में उत्तम, मध्यम, अधम हैं, अर्थात्‌ शुक्लपक्ष की प्रतिपदा अधम, षष्ठी मध्यम, एकादशी उत्तम और कृष्णपक्ष में प्रतिपदा उत्तम, षष्ठी मध्यम, एकादशी अधम है । ऐसे ही भद्रा आदि तिथियों में भी जानना चाहिए और यही तिथियाँ क्रम से छझुक्र, बुध, मंगल, शनेरचर, बृहस्पति इनके दिनों में हों, अर्थात्‌ शुक्र केदिन नन्‍्दा, बुध के दिन भद्गरा, मज्भल के दिन जया, शनेहचंर के दिन रिक्ता और बृहस्पति के दिन पूर्णा हो तो किये हुए कार्य की सिद्धि करनेवाली होती हैं। इस कारण सिद्धा भी नाम है ॥| ४॥।

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