Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 1 · · Verse 5
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

सुर्यादि वारों में निषिद्ध तिथि और निषिद्ध नक्षत्र नन्‍्दा भद्रा नन्दिकाख्या जया च रिक्ताभद्रापुणसंज्ञाइधमार्कात्‌ याम्य॑ त्वाष्टूं बेश्वदेवं धनिष्ठाय्यस्णं ज्येष्ठान्त्यं रवेदंग्धर्भ स्थात्‌ ॥ ५॥ अन्वय:--अर्कात्‌ (क्रमेण )नन्‍दा, भद्रा, नन्दिकाख्या, जया, रिक्‍ता, भद्रा, पूर्णसंज्ञा अधमा स्यात्‌ । च (पुनः) रवेः याम्यं, त्वाष्ट्रें, वेश्वदेवं, धनिष्ठा, अर्य॑म्णं, ज्येष्ठा, अन्त्यं (क्रमेण) दग्धभं स्यथात्‌ ॥ ५ ॥। सूर्यादि वारों में नन्‍्दा, भद्गा, नन्‍्दा, जया, रिक्‍ता, भद्रा, पूर्णा ये : तिथियाँ क्रम से मृतसंज्ञक हैं, अर्थात्‌ रविवार को नन्‍्दा, सोमवार को भद्रा, मंगल को नन्‍्दा, बुध को जया, बृहस्पति को रिंक्ता, शुक्र को भद्रा और शनैइचर को पूर्णा मृतसंज्ञक होती है। इनमें कोई शुभ कार्य न करना चाहिए। 'पूर्णामृतार्कात्‌' इसमें अकार का प्रहइलेष मानने से अमृत संज्ञां होती है अर्थात्‌ शुभप्रद है। कुछ प्राचीन आचार्यों ने ऐसा ही कहा है | सूर्यादि वारों में क्रम सेभरणी, चित्रा, उत्तराषाढ़, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, ज्येष्ठा और रेवती ये नक्षत्र दग्धसंज्ञक हैं, अर्थात्‌ रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगल को उत्तराषाढ़, बुधवार को धनिष्ठा, बृहस्पति को उत्तराफाल्गुनी, शुक्र को ज्येष्ठा और शनेइचर को रेवती दग्धसंज्ञक हैं । इनमें कोई शुभ काये न करना चाहिए॥ ५॥।

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse