Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
केचिय्यामोत्तरं चान्ये यात्रायामेव निन्दितान् अन्बयः--इन्दौ शस्ते मृत्युक्रकचदग्धादीन् (योगान् ) शुभान् जगु:। केचित यामोत्तरं (शुभान् जगुः) । अन्ये यात्रायामेव निन्द ितान् जगु: ॥| ४१॥। कोई आचाये चन्द्रमा के शुभ रहते मृत्यु योग, क्रकचयोग, दग्धयोग, विषाख्य और हुताशनाख्य योग को शुभ कहत e हैं, और कोई कहते हैं कि एक पहर के बाद ये सब योग शुभ होते हैं । कोई तो कहते हैंकि ये यात्रा में ही निन्दित हैं ।। ४१॥
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