Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
लुप्तसंवत्सर दोष और उसका परिहार रगो नो पूव्व॑राशि गुरुरेति वक्तितः । गोजान्त्यकुम्भेतरभेइतिचा तदा विलुप्ताब्दहहातिनिन्दितः शुभेषु रेवासुरनिम्नगान्तरे ॥ ५३ ॥ अन्वयः--गो जान्त्यकुम्भेतरभे अतिचारग: गुरु: वक्रित: (पुनः) पूर्वराशि नो एति तदा लुप्ताब्द: | (स) इह रेवासुरनिम्नगान्तरे शभेष् अतिनिन्दितः ' (स्यात्) ॥ ५३॥। बृष, मेष, मीन और कुम्भ के अतिरिक्त अन्य किसी राशि में स्थित बृहस्पति उस राशि से अगली राशि में अतिचार करके गया हो और फिर वक्री होकर पूर्वराशि में जिस वर्ष में न आया हो वह लुप्तसंवत्सर कहा जाता है। वह विवाहादि शुभकाये में अतिशय निन्दित है, परन्तु नर्मदा और गंगा के मध्य ही में निन्दित है ॥ ५३ ॥।
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