Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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कालहोरा का प्रयोजन बारे प्रोक्तं कालहोरासु तस्य छिष्ण्ये प्रोक्त स्वामितिथ्यंशके5स्य । कुर्याहिक्श लादि चिन्त्य॑ क्षणषु नंवोल्लड-ध्यः पारिघदचापिदण्ड: ॥ ५६॥। अन्वयः--वारे प्रोक्तं (कर्म) तस्य (वारस्थ) . कालहोरासु कुर्यात् ।4(तथा) ध्िष्ण्ये प्रोक्तं अस्य स्वामितिथ्यंशके (मुह॒त )कुर्यात् । क्षणेष (मुहरत्तेष) दिकशलादि (अवश्य) चिन्त्यम् । पारिघ: दण्ड: अपि नैब उल्लंघ्य: ।। ५६ ।। जो का जिस वार में विहित है वह आवश्यक हो तो उसके कालहोरा में करने को महषियों ने कहा है, और जो कार् y जिस नक्षत्र में विहित है वह उस नक्षत्र के स्वामी के मुहूर्त्त में करे । इन मुह॒र्तों मेंभीदिक्शूल, वारशूल, नक्षत्रशूल आदि का विचार करना चाहिए, और परिघ दण्ड का उल्लंघन तो किसी तरह भी न करे ॥ ५६॥।
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