Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 1 · · Verse 44
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--पउचढ्धचद्रिकृताष्टराम रसभूयामादिघंट्य: शराः विष्टे: आस्य॑ (प्रोक्तं तत्‌) असत्‌ | गजेन्दुरसरामाद्रृश्विबाणाब्धिषु यामेषु अन्त्यघटीतय॑ विष्टे: पुच्छ (प्रोक्तं तत्‌) शुभकरं । तिथ्यपराध॑जा विष्टि:. वासरे तथा पूर्वाधजा विष्टि: रात्ौ शुभकरी (भवति) ॥| ४४ ॥। चौथि, अष्टमी, एकादशी, पूर्णमासी, तीज, सप्तमी, दशमी और चतुर्दशी, इन तिथियों में क्रम से पाँचवें, दूसरे, सातवें, चौथे, आठवें, तीसरे, छठे और पहिले, इन पहरों की पूर्व की पाँच घड़ी भद्रा का मुख है वह अशुभ होता है । तिथि के उत्तराद्ध में होनेवाली भद्गरा यदि दिन में होऔर तिथि के पूर्वार्द्ध में होनेवाली भद्गा यदि रात्रि में होतो शुभ होती है ।। ४४ ।।

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