Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 1 · · Verse 47
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--इज्यसितयो: ब॒द्धत्वास्तशिशुत्वे (तथा) न्यूनाधिमासे कक कपभवनारम्भप्रतिष्ठ, ब्रतारम्भोत्सगवधूप्रवेशनमहादानानि, सोमाष्टके गोदानाग्रयणप्रपाप्रथमकोपाकर्म, वदब्रतम, नीलोद्ाहं, अथ अतिपन्नशिशुसंस्कारान्‌, सुरस्थापनम्‌, दीक्षामौज्जिविवाहमुण्डनम्‌, अपूर्व देवतीर्थेक्षणम्‌, संन्यासाग्निपरिग्रहौ नृपतिसंदर्शाभिषेकौ, गमम्‌, चांतुर्मास्यसमाव॒ती, श्रवणयोववेध, परीक्षां त्यजेत्‌ ॥| ४६-४७ ॥। काम्य वृषोत्सर्ग पिछड़े हुए जातकर्म नामक आदि संस्कार, देवताओं का स्थापन, मन्त्रग्रहण, यज्ञोपवीत, विवाह, मुण्डन, किसी देवला का प्रथम दर्शन, तीथ्थयात्रा, संन्यास, अन्निहोत्रादि के लिए अग्नि का ग्रहण करता, राजा का प्रथम दर्शन, राजा का अभिषेक, यात्रा, चातुर्मास्य नामक योग समावतंन कम, कर्णछेदन, इन सब कर्मों को बृहस्पति ओर शुक्र के वृद्ध, बाल वा अस्त रहते, मलमास और क्षयमास में न करना चाहिए ॥।| ४६-४७ ॥।

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