Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 1 · · Verse 48
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--अस्ते वर्ज्य (कर्म) सिहनक्रस्थजीव5पि वज्येम्‌ । केचित्‌ [आचार्या: | वक्रगे च (तथा) अतिचारे [जीव | गुर्वादित्ये, विश्वघस्र पक्षेषपि (वर्ज्य) तद्बत्‌ दन्तरत्नादिभूषां (च) (वर्ज्य) प्रोचु: | ४८॥। बृहस्पति वा शुक्र के अस्त में जिन शुभ कर्मों का निषेध कियाहै वे सब कम सिंह वा मकर राशियों में बृहस्पति के रहते भी वर्ज्य हैं। कोई आचाये कहते हैं कि बृहस्पति के वंक्री रहते वाअतिचार करते और गुर्वा- दित्य अर्थात्‌ सूय और बृहस्पति के एकत्र रहते पूर्वोक्त शुभ कर्म न करे । उसी तरह दाँत और रत्नसे बने हुए आभूषणों को बृहस्पति वा शुक्र के अस्तादि काल में न धारण करे ॥| ४८॥।

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