Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
सिहस्थ बृहस्पतिदोष का परिहार --कै- सिंहे गुरो सिहलवे विवाहों नेष्टो$थ गोदोत्तरतरइच यावत् । भागीरथी याम्यतंट च दोषों नान््यत्र देश तपनेदपि सेथे ।। ४९॥। अन्वयः--सिंहे सिहलकें ग्रो (सति) विवाह: नेष्टः, अथ गोदोत्तरत: भागीरथी याम्यतर्ट (यावत्) दोषः । अन््यत्र देशे न (दोषः) । मेषे तपने [सूर्य |अपि (दोष: न) ॥ ४६ ।। सिहराशि में सिह ही के नवांश में बृहस्पति स्थित हो तो विवाह इष्ट नहीं है। अथवा सिह राशि में बृहस्पति के रहते गोदावरी नदी के उत्तर किनारे से लेकर गज्जा के दक्षिण किनारे तक के देशों में विवाहांदि शुभ कार्य करने में दोष है, अन्य देशों में नहीं ।अथवा सिंह राशि में बृहस्पति के रहते भी मेष में सूर्य स्थित हो तो विवाहादि शुभकरम करने में दोष नहीं है ॥॥ ४९ ॥।
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