Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 1 · · Verse 33
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

सु्यं और चन्द्रग्रहण के त्याज्य नक्षत्र ओर दिन नेष्ट ग्रहर्ष सकलाउंपादग्रासे क्रमात्तकंग्ुणन्दुमासान्‌ । पृत्॒परस्तादुभयोस्त्रिघल्ना ग्रस्तेइस्तगे वाप्युदिते5छूंखण्डे ॥ ३३॥। अन्वयः--सकलार्धपादग्रासे क्रमात्‌ तकंगुणेन्दुमासान्‌ ग्रहक्क्ष॑ नेष्टम्‌ । ग्रस्ते3स्तग पूर्व त्रिघस्ना नेष्टा: । ग्रस्तेउभ्यूदिते परस्तात्‌ (त्रिघस्ना नेष्टा: )। अधंखण्ड (ग्रासे) उभयोः (पूर्वापरयो:) त्विघस्रा: (त्रित्रिघस्रा:) नेष्टा: ॥ ३३ ॥ चन्द्रमा वा सूर्य केबिम्ब का सर्वग्रास हो तोछः महीने तक, अड़ंग्रास हो तो तीन महीने तक, चतुर्थाश का ग्रास हो तो एक ही महीने वह नक्षत्र त्याज्य होता है जिस नक्षत्र में ग्रहण हुआ हो । अर्थात्‌ उक्त दिनों तक उस नक्षत्र में कोई शुभ कार्य न करे। यदि ग्रहण लगते ही सूर्य या चन्द्र अस्त हो जाय तो पहले तीन दिन में और यदि ग्रसित सूर्य या चन्द्रमा उदय हो तो ग्रहण होने के अनन्तर ठीन दिन में कोई शुभ काये न करना चाहिए । यदि अद्ंग्रास हो तोतीन दिन पहले और तीन दिन पद्चात्‌ और ग्रहण का दिन भी शुभ कर्मों में त्यागना चाहिए ॥। ३३॥

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