Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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कुलिक आदि दुष्ट मुहत्तं कुलिकः कालवेला च यमघण्टइच कण्टकः । वारादद्विघ्ने ऋरमान्मन्दे बुधे जीवे कुजे क्षण: ॥ ३७१ अन्वयः--वा रात् मन्दे बुधे, जीवे, द्विष्ने (सति) क्रमात् कुलिक:. कालवेला यमघण्ट:, कण्टक:, क्षण:, (मूह॒तः स्यात् ) ।। ३७ ।। जिस दिन कुलिकादि दोषों का विचार करना हो उस दिन से शनेश्चर, बुध, बृहस्पति और मंगल तक गिनने से जितनी संख्या हों उनको दो से गुणा करे । उसी संख्यावाला मुहूत्त क्रम से कुलिक, कालवेला, यमघण्ट और कण्टक दोष होता है। कुलिक मुहृत्ते में शुभ कर्म करने से सर्वथा नाश, यमघण्ट में दरिद्रता, कालवेला में मृत्यु और कंटक में विध्न होता है । परन्तु ये रात्रि में दूषित नहीं हैं ॥। ३७॥।
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