Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 1 · · Verse 36
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

पक्षरन्थ्रतिथि और उनका परिहार बेदाड्भराष्टनवाकन्द्रपक्षरन्थ्रतिथौ त्यजेत्‌ । वस्वड्भमनुतत्त्वाशा शरा नाडीः पराः शुभाः ॥ ३६॥। अन्वयः--बे दाज्भाष्टनवाकन्द्रपक्ष रन्ध्रतिथौ (क्रमेण) वस्वद्धूमनुतत्त्वाशा: नाड़ी: त्यजेत्‌, परा: शुभा: शरा: (भवन्ति) ॥| ३६ ॥ चौथि, छुठि, अष्टमी, नवमी, द्वादशी और चतुदशी इन तिथियों की पफक्षरंप्र संज्ञा है। इनमें कोई शुभ कार्य न करे। किन्तु यदि कोई आवश्यक कार्य हो तो चौथि के आठ दण्ड, छठि के नव, अष्टमी के चौदह, नवमी के चौबिस, द्वादशी के दश और चतुर्देशी के पाँच दण्ड त्याग दे, शेष सब शुभ हैं ॥ ३६॥।

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse