Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
अन्वयः--विष्कुम्भवज्भघटिकात्रयं एव वज्यंम् । सर्वेषु कर्मसु परिघार्ध॑(वर्ज्यम्), शूले पञच, गण्डातिगण्ड्यो: षट्, व्याघाते नव नाड्य: वर्ज्या: ॥ ३४-३५॥ * विष्कुम्भ और वज्त्र केतीन तीन दण्ड परिघयोग का पूर्वार्, शूलयोग के प्रथम पाँच दण्ड, गण्ड और अतिगण्ड के छ: छः दण्ड और व्याघात योग के नवदण्ड सम्पूर्ण शुभ कार्यों में व्जनीय हैं ।| ३४-३५ ॥।
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