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Vivaha Vrindavana · Chapter 14

Mishra Prakarana (Miscellaneous Chapter)

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1
वर को चाहिये कि--वक्ष्यमाणनिमित्तों से, सामुद्रिकलक्षणों को समक्ष कर कन्या का वरण करे। इसी प्रकार कन
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स्वप्न, शगुन आदि निमित्त, शकुन, पूर्वाजित कर्म, शरीरलक्षण, आगन्तुक (जातक), दिव्य, भौम, आन्तरिक्ष उत्
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जैसे जल, वायु और पृथ्वी के संस्कार से बीज की उत्पत्ति और वृद्धि होती है, उसी प्रकार वर्तमान समय में
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यदि प्रारब्ध ही फलीभूत होता तो कृषि वाणिज्य आदि के उपायों में लोग यत्न क्यों करते हैं; लोग ही नहीं,
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जो चन्द्रबिम्बस्थ कलंकलेखा को न देखे, तथा ध्रुव, नक्षत्रमण्डल, मातृतारकामण्डल न देखे, जिसका पैर कीचड
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जिसका शरीर भीजने पर सब अंगों से पहले हृदय सूखे, जिसके मुख में तर्जनी मध्यमा और अनामिका ये तीनों अंगु
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जो ज्वर आदि बिना कारण के बहुत थोड़ा भोजन करे, वा अस्मक आदि रोग बिना बहुत खाय, उचित अनुचित में जिसका
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जिसके स्वप्न में शरीर से रोम, नह वा वामनेत्र गिर पड़े, वा मनुष्य से भिन्न (व्याघ्र आदि) जन्तुओं को द
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जो मनुष्य स्थिर दृष्टि से अपनी छाया को देखकर क्षणभर आकाश को देखता हुआ फिर अपने शरीर को स्वच्छ मेघ के
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शरीर में सव्य आवर्त (दहिने तरफ से घुमा हुआ) रोमवाला, वृष के समान गम्भीर शब्दवाला, जिसके मूत्र त्याग
16
जिस का दाढ़ी मुछ से श्याम वर्ण और ऊँचा ओठ हो, बड़ा बड़ा हाथ पेर हो, छोटे छोटे और रूखे अग्रभाग वाले क
17
दीर्घ नितम्ब (चूतर) वाली पति को, दीर्घ ललाटवाली देवर को और दीर्घ उदरवाली श्वशुर को नाश करती है। तथा
18
जिसकी शिरायें (शरीर की नाड़ियाँ) अत्यन्त कृश हो वह स्त्री निर्धन होती है, और शिरायें मोटी मोटी हों त
19
स्त्रियों के अंगुष्ठमूल से नीचे जितनी रेखायें हों उनमें बड़ी रेखा के तुल्य पुत्र और छोटी रेखा के तुल
20
हाथ के मध्य में एक तिरछी रेखा जो तर्जनी अंगुली की तरफ जाती है वह आयुदाय रेखा, और तर्जनी तथा अंगूठा क
21
हस्तमूल (मणिबन्ध से) निकली हुई और ऐश्वर्य रेखा के अग्र से मिली हुई रेखा पितृवंश रेखा कहलाती है। यदि
22
कनिष्ठामूल और आयु रेखा के मध्य (करभप्रदेश) में स्त्री के हाथ में पति रेखा, और पुरुष के हाथ में स्त्र
23
अनामिका अंगुली मूल को विभूषित करने वाली (अर्थात् अनामिका के मूल और आयुरेखा पर्यन्त खड़ी) रेखा पुण्य
24
अत्यन्त चिकनी गहिरी देखने में मनोहर और मधु समान पिङ्गलद्रव्य की प्रथक-प्रथक रेखा पुरुष के दहिने अंग
25
पुरुष अथवा स्त्री के पैर वा हाथ में यदि कमल, विश्व वृक्ष, ध्वजा, हस्ती, मछली, स्तम्भ, कलश, माला, ऐना
26
यदि वचन आदरणीय, मन उच्च, शरीर नेत्रों को अत्यन्त सुखप्रद तथा बुद्धि पापकर्म से निवृत्त हों तो अन्य श
27
वर जिस समय कन्या का वरण करे उस समय पुलिंग पक्षी और स्त्रीलिंग में दुर्गा (कृष्णचीटिका) पक्षी ये दोनो
28
जिस समय कन्या वर का वरण करे उस समय दाहिने भाग होकर कुकुर का चलना शुभ है। और जिस समय वर कन्या का वरण
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चाक्षुस से पूर्ण प्रस्थ आदि (सेर, पौआ, आदि) अन्न नापने के पात्र को संमार्जिनी (झाड़ू) से ढककर उस पर
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श्रवण, तीनों पूरो, धनिष्ठा, कृत्तिका, अनुराधा, उत्तराषाढा, स्वाती इन नक्षत्रों में कन्या का वरण करना
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विवाह के लिये वेदी इस प्रकार बनाना चाहिये जिससे वह गृह (मण्डप) में प्रवेश करते समय दाहिने भाग पड़े।
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सुवासिनी स्त्री सहित कन्या शौनकादिकथित विधि से शची की पूजा करे। और गौरी आदि षोडशमातृका तथा माता माता