Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
जो ज्वर आदि बिना कारण के बहुत थोड़ा भोजन करे, वा अस्मक आदि रोग बिना बहुत खाय, उचित अनुचित में जिसका स्वभाव बदल जाय; जो अंगुलियों से नेत्रप्रान्त को ढाँपकर मेचकवर्ण चान्द्रक (खद्योतवत् भासमान) न देखे, जो लाट मध्य में मणिबन्ध (तलहथ के नीचे का गाँठ) को रखकर दुबला पहुंचा को न देखे, वा बिना कारण शव के समान गन्ध शरीर में हो जावे, अथवा जिसके केश में सब जगह सीमन्त (कंघे से बनाई रेखा के समान रेखायें) हो जाये, इस प्रकार के वरों का वरण नहीं करना चाहिये ॥ ८-९ ॥
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