Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
जिसका शरीर भीजने पर सब अंगों से पहले हृदय सूखे, जिसके मुख में तर्जनी मध्यमा और अनामिका ये तीनों अंगुलियाँ साथ जोड़कर न समाय, स्नान करने पर जिसके मस्तक से धुआँ चले, अथवा जिसके मस्तक पर खाली मुँहवाला पक्षी बैठे, जो कान ढापने पर अन्तर का शब्द न सुने, बहुत खाने पर भी जिसकी तृप्ति न हो, जो कान्तिमान अकस्मात् कान्तिरहित वा कान्तिरहित भी कान्तियुक्त हो जाय, जो अकस्मात् दुबले से मोटा वा मोटा से दुबला हो जाय, इस प्रकार के वर का वरण नहीं करना चाहिये ॥ ६-७ ॥
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