Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
जैसे जल, वायु और पृथ्वी के संस्कार से बीज की उत्पत्ति और वृद्धि होती है, उसी प्रकार वर्तमान समय में क्रियमाण कर्म (उद्योग) प्राककर्म का शोषक (नाश करनेवाला) और पोषक (बढ़ानेवाला) होता है। अर्थात् उद्योग से ही शुभ फल का लाभ, और अशुभ फल का नाश हो सकता है अन्यथा नहीं। इसलिये सदाचारवान् (श्रुति स्मृति विहित धर्म के पालन करने वालों) की कभी हानि नहीं हो सकती है ॥ ३ ॥
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