HomeLibraryVivaha VrindavanaCh.3 · Melaka Prakarana (Compatibility/Matching)
Vivaha Vrindavana · Chapter 3

Melaka Prakarana (Compatibility/Matching)

23
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1
वर कन्या, वा सेव्य सेवक की जन्मराशियों में परस्पर द्वितीय-द्वादश, पञ्चम-नवम, षष्ठ-अष्टम में मैत्रीवि
2
यदि राशियों के स्वामी में मैत्री हो, वा एक ही हो तो सब (द्वादश आदि) में भी मेल होता है। अब तारा विचा
3
वर कन्या के भिन्न राशि और एक नक्षत्र हो, वा एक राशि और भिन्न नक्षत्र हो तो दोनों में अत्यन्त प्रेम ह
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एक नक्षत्र एक राशि होने पर चरण भेद से परस्पर प्रीति होती है, ऐसा पराशर मुनि ने कहा है। वशिष्ठ के शिष
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जैसे आग अपने शरीर को नहीं जलाती है, और देखने वाला जैसे अपनी दृष्टि का दृश्य नहीं होता है, इसी प्रकार
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आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठामूल, शतभिषा, पूर्वभाद्रपदा और अश्विनी यह प्रथम नवक,
7
'त्रिचरण नक्षत्रोत्पन्न कन्या का चतुर्नाडी चक्र में, और द्विचरणनक्षत्रोत्पन्न का पञ्चनाडी चक्र में व
8
अश्व १, गज २, छाग ३, सर्प ४, सर्प ५, श्वान ६, मार्जार ७, मूस ८, मार्जार ९, सूस १०, मूस ११, गो १२, मे
9
रोहिणी, पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, पूर्वभाद्रपदा, उत्तरभाद्रपदा, आर्द्रा,
10
धनु, मेष को वृष से; कुम्भ-मिथुन को कर्क से; मेष को कन्या से; तुला-मिथुन को वृश्चिक से; धनु को मकर से
11
कुम्भ और सिंह में राशि मैत्री होने के कारण उनके स्वामियों (शनि, सूर्य) में शत्रुता रहने पर भी विवाह
12
स्वामियों में विरोध रहने पर नौकरों में यदि मेल भी हो तो वह अमेल (विरोध) ही समझा जाता है। इसलिये राशि
13
यदि ऐसा कहा जाय कि — स्वामी के परोक्ष में ही सेना में विरोध होने से वध होता है, स्वामी के समक्ष में
14
राशियों की स्वभावमैत्री १, स्वामियों की मैत्री २, वशित्व ३, और नक्षत्र-योनि मैत्री ४ — इन चारों में
15
जन्मकुण्डली में ग्रहों के अपने स्थान से दोनों तरफ के दो केन्द्रों के बीच में (अर्थात् २, ३, ४, १२, १
16
गुरु और शुक्र ब्राह्मणों के अधिपति हैं, सूर्य और मंगल क्षत्रियों के, चन्द्रमा वैश्यों का, बुध शूद्रो
17
सूर्य के बृहस्पति, चन्द्रमा के बुध-बृहस्पति, मंगल के बुध-शुक्र, बुध के रवि छोड़कर सब ग्रह, बृहस्पति
18
वराहमिहिर ने भी उपरोक्त यवनोक्त ग्रह-मैत्री अपने बृहज्जातक में कहकर फिर उसे दूषित नहीं किया। क्योंकि
19
यदि अपने मत में दूसरों का मत रख कर उसमें दोष न दिया जाय तो वह (परमत) स्वीकृत ही समझा जाता है। अतः के
20
वराहमिहिर ने यवनमैत्री को कहते हुए हृदय में उसका अल्पमतत्व क्यों रखा? खण्डन क्यों न किया? इसका उत्तर
21
यदि ऐसा कहा जाय कि 'वराहमिहिराचार्य बहुसम्मत को ही मानते हैं' तो यह भी असङ्गत ही है, क्योंकि — पृथक्
22
वर कन्या के चन्द्रनवांश के पतियों में मैत्री हो तो शुभ होता है — यह देवल मुनि ने कहा है। परन्तु उसे
23
जो आचार्य लग्नदृष्टि को छोड़कर केवल नवांशदृष्टि से ही विवाह में फल मानते हैं, वे भी चन्द्रनवांश मैत्