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Vivaha Vrindavana · Chapter 4

Navamsha Consideration

19
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2
इसलिये लग्न में द्विपद नवांश को शुभ मानने वाले ग्रन्थ मैत्री को स्वीकार करें। अन्यथा (नवांश मैत्री व
3
यदि ऐसा कहा जाय कि परस्पर सप्तम में मैत्री होती है इसलिये धनु-मिथुन द्विपद होने के कारण शुभ है — तो
4
वृष और मीन गैर-द्विपद की राशि होने पर भी द्विपद नहीं हैं — इसलिये अग्राह्य है, ऐसा कहा जाय तो — शोनक
5
यदि ऐसा कहो कि — द्विपद और शुभग्रह की राशि इन दो में से एक भी हो तो ग्रहण किया जाता है। परन्तु हे मि
6
यदि उदय और अस्त के नवांशाधिपों में मैत्री होना ही कारण हो तो — वह मैत्री यवनशाखा में ही प्रसिद्ध है।
7
परस्पर-समसप्तक की मैत्री दोनों (यवन और सत्याचार्य) के शाखा में असूक्ष्म कैसे हो सकता है? अर्थात् सूक
8
उपरोक्त कारणों से — तुला, मिथुन, कन्या और धनु का पूर्वार्ध इनमें शुभ फल होता है, ऐसा प्राचीनाचार्यों
9
लग्नगत नवांश का स्वामी नवांश से अथवा लग्न से ३, ८, १२, २ इन स्थानों में हो तो वर का नाश करता है। यदि
10
लग्न और नवांश दोनों की दृष्टि विशेषत: होने के कारण सम्पूर्ण फल देती है। केवल लग्न की दृष्टि कुछ न्यू
11
अवयवी को देखने पर भी क्या कोई अवयव अदृश्य नहीं होता है? अवश्य अदृश्य होता है। इसलिये केवल लग्न-दृष्ट
12
नवांशपति खञ्च को देखने पर उसके मध्यस्थ अपने नवांश को भी देखता ही है। अगर ऐसा कहो कि — जिस नवांश को व
13
यदि नवांश लग्न के अन्तरगत ही है तो — लग्न पर स्वामी की दृष्टि होने से नवांश भी दृष्ट होगा, जैसे पति
14
यदि लगेश लग्न को और सप्तमेश सप्तम को न देखे तो लग्न और नवांश का फल नष्ट हो जाता है, ऐसा किसी ने कहा
15
जन्मलग्न और जन्मराशि से अष्टमेश की राशि के वा अष्टमस्थानस्थित ग्रह की राशि के नवांश लग्न में हो तो व
16
जन्मलग्न और जन्मराशि से वृष-वृश्चिक से अतिरिक्त अष्टमराशि विवाहलग्न में छोड़ देना चाहिये। क्योंकि अष
17
मकर वा तुला में चन्द्रमा हो तो चरलग्न में वर-नवांश त्याज्य है। क्योंकि उसमें विवाहिता स्त्री कामातुर
18
चतुर्थेश आदि सुखकारक ग्रह निर्बल हो तो जन्मलग्न-जन्मराशि से चतुर्थ राशि विवाहलग्न में सुखनाशकारक होत
19
जन्म समय में अशुभकारक पापग्रह जिस नवांश में हो वह विवाहकालिक चन्द्रमा में वा लग्न में पड़े तो वर-कन्
20
जन्मलग्न से अष्टमस्थान स्थित ग्रह और अष्टमेश जो हो वह ग्रह यदि विवाहलग्न में पड़े तो कभी शुभ नहीं हो