Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
जन्मलग्न और जन्मराशि से वृष-वृश्चिक से अतिरिक्त अष्टमराशि विवाहलग्न में छोड़ देना चाहिये। क्योंकि अष्टमस्थ वृश्चिक और वृष के स्वामी ही लग्न का भी स्वामी होता है, इसलिये शुक्र और पुलस्ति के मत से दोष नहीं आता है। (मेष लग्न में अष्टम वृश्चिक, और तुला लग्न में अष्टम वृष पड़ता है, अतः एकाधिपत्य होने के कारण वृष, वृश्चिक अष्टम होने पर भी विवाह लग्न में ग्राह्य है।)
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