HomeLibraryVivaha VrindavanaCh.5 · Lagna Strength
Vivaha Vrindavana · Chapter 5

Lagna Strength

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स्त्रियों के पाणिग्रहण समय में लग्न से ६, ३, ११, ८ इन स्थानों में रवि हो तो अनायास सुख, पुत्र और धनद
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चन्द्रमा विवाहलग्न से ३, २, ११, ४ इन स्थानों में शुभप्रद है। और ८, १, ६ इन स्थानों में अत्यन्त अशुभ
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मंगल विवाहलग्न से ३, ११, ६ में वृद्धिका होता है। और ८, १, ७ में मरणकारक होता है। यदि १० स्थान में हो
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बुध विवाहलग्न से १२ को छोड़कर शेष (१, २, ३, ४, ५, ६, ७, ९, १०, ११) स्थानों में गृह, पुत्र और धनदायक
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बृहस्पति विवाहलग्न से ७, १२ को छोड़कर शेष (१, २, ३, ४, ५, ६, ९, १०, ११) स्थानों में आनन्द और सम्पत्त
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शुक्र विवाहलग्न से ३, ६, ८, ७ इन स्थानों में महाभयकारक होता है। शेष स्थानों में अतिशय मंगलकारक है। त
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विवाहकालिक लग्न और चन्द्रमा में पापसम्बन्धी दुरधरा (कर्तरी योग) हो तो स्त्री दुःखभागिनी (पतिरहिता) ह
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गुरु और शुक्र उदय से पीछे और अस्त होने से पूर्व ७-७ दिन शुभकार्य के विनाशकारक होते हैं। अर्थात् ७ दि
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बृहस्पति के उदय से बाद १० दिन बाल्य और अस्त से पहिले १४ दिन वृद्धत्व रहता है। एवं गति-वश से शुक्र के
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रवि, गुरु, नवांशपति, लग्नपति, और चन्द्रमा इन पाँचों के बल विना, ब्रह्मा का लिखा हुआ भी स्त्रियों का
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विवाहलग्न से १२ स्थान यदि बुध, गुरु वा शुक्र इनमें से किसी एक से युक्त न हो तो — वर और कन्या तथा उसक