Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
परस्पर-समसप्तक की मैत्री दोनों (यवन और सत्याचार्य) के शाखा में असूक्ष्म कैसे हो सकता है? अर्थात् सूक्ष्म ही है। परञ्च वह मैत्री एक ही प्रकार की नहीं है, अर्थात् तात्कालिक नैसर्गिक भेद से अनेक प्रकार है। इसलिये सब (यवन-सत्य आदि) आचार्यों ने पापग्रहराशियों को भी स्वीकार किया है, अर्थात् लग्न में सब राशि गृहीत है।
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