Vivāha Vṛndāvana
Chapter 3 · Melaka Prakarana (Compatibility/Matching) · Verse 5
Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
Translations
Hindi

जैसे आग अपने शरीर को नहीं जलाती है, और देखने वाला जैसे अपनी दृष्टि का दृश्य नहीं होता है, इसी प्रकार एक चरण होने पर एक नक्षत्र में नाडीवेध का दोष नहीं हो सकता है — यह वशिष्ठ के शिष्य का दृष्टान्त है। इसमें आचार्य दोष देते हैं कि — एक चरण में तुल्य प्रभाव होने के कारण भर्ता और भार्या का व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकता है। अर्थात् स्त्री को पति के अधीन होना चाहिये — एक नवांश में तुल्य सामर्थ्य होने से स्त्री अपने स्वामी के वश में नहीं रह सकती है, अतः परस्पर प्रीति नहीं होने के कारण एक नक्षत्र के एक चरण त्याज्य है।

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