Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
यदि अपने मत में दूसरों का मत रख कर उसमें दोष न दिया जाय तो वह (परमत) स्वीकृत ही समझा जाता है। अतः केवल सत्याचार्य के वचनों को संग्रह करने वाले वराहमिहिर ने भी निश्चय यवनाचार्यों की कही उक्त ग्रहमैत्री में स्पृहा की है।
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