Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
वराहमिहिर ने यवनमैत्री को कहते हुए हृदय में उसका अल्पमतत्व क्यों रखा? खण्डन क्यों न किया? इसका उत्तर कहते हैं — क्योंकि यवनाचार्य का मत श्रेष्ठ माना जाय तो हम भी श्रेष्ठ समझे जायेंगे, सत्याचार्य के मत श्रेष्ठ हों तो हम श्रेष्ठ हैं ही, इस प्रकार दोनों पक्ष बराबर अर्थात् दोनों हाथ लड्डू हैं।
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