Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
यदि ऐसा कहा जाय कि 'वराहमिहिराचार्य बहुसम्मत को ही मानते हैं' तो यह भी असङ्गत ही है, क्योंकि — पृथक् पृथक् द्विगुण, त्रिगुण स्थित होने पर भी उन्होंने एक बार त्रिगुण करना ही कहा है, परन्तु ऐसी बहुतों की सम्मति नहीं है। इसलिये यवनोक्त मैत्री ग्राह्य है।
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