Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
Translations
Hindi
राशियों की स्वभावमैत्री १, स्वामियों की मैत्री २, वशित्व ३, और नक्षत्र-योनि मैत्री ४ — इन चारों में क्रमशः पूर्व के अभाव में पर, पर को देखना चाहिये। अर्थात् प्रथम राशियों की स्वभावमैत्री (समसप्तकादि) देखना, इसके अभाव में स्वामियों की मैत्री देखना, इसका भी अभाव हो तो वशित्व देखना, इसके अभाव में नक्षत्रयोनि की मैत्री देखना, यदि साथ ही चारों की शुद्धि मिल जाय तब तो त्रिवर्ग (धर्म, काम, अर्थ तीनों) ही हस्तगत समझना।
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