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Vivaha Vrindavana · Chapter 7

Rahu Satta (The Authority of Rahu)

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चन्द्रविमण्डल (चन्द्रमार्ग) और क्रान्तिमण्डल (सूर्यमार्ग) इन दोनों वृत्त का योग ही पात कहलाता है, इस
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राहु के गृहत्वरूप क्रान्तिवृत्त और चन्द्रमण्डल के दोनों सम्पात से जब आकाश में रवि और चन्द्रमा दूर रह
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राशिवृत्त में रहने के कारण सूर्य के समान ही राहु भी भाव और गोचर फल देता है जो संहिता में प्रसिद्ध है
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चन्द्र और सूर्य के ग्रहण से गर्वित होने के कारण यह चन्द्रपात दूसरे (भौमादि) ग्रहों के पात की तुलना म
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ब्रह्मा के आदेश से राहु प्रथम सम्पात से दूसरे द्वितीय सम्पात में जाता है। वह (द्वितीयपात) भी राहु का
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गतिवश से चन्द्रपात के समान चन्द्रमा का उच्च भी फलप्रद हो — ऐसा अगर कहो, तो सही है, परञ्च क्या करें ब
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और भी यह है कि — जिस भूमध्य को केन्द्र मानकर गोल गणित किये गये हैं, वहाँ स्थित होकर पातमार्ग में ही
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जो कुजादि ग्रहों के पात दिन में एक विकला का आधा भी नहीं चलते हैं, उनसे फल क्या हो सकता है? क्योंकि ज
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और भी प्रमाण है कि — ब्रह्मगुप्त, सोम, रोमक, मयासुर आदि से वसिष्ठ, नारद, ब्रह्मा आदि शाखकारों ने राह
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अगर फल देने में उच्च पृथक् पृथक् हो तो, शनि, मंगल और गुरु इन तीनों का उच्च सूर्य ही को क्यों मानते?
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यह सत्य है कि राहु में दिनाधिपत्य, वर्षाधिपत्य आदि नहीं है। परञ्च जिसकी छाया सब ग्रहों के अधीश सूर्य
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ग्रह प्रतिदिन चरता हुआ ही कुछ फल देता है, क्योंकि वह चारफल कहलाता है। और जिस नक्षत्र में ग्रहण होता
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जब राहु का अपर अंग (केतु) आकाश में उदित होता है, तो वह भी प्रतिदिन चलता है। और बिना गति के शुभाशुभ क
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ग्रहण में प्राप्त अन्धकार तो उत्पात मात्र है जिसे लोग त्याग कर देते हैं, क्या वह ग्रह है? अर्थात् ग्
18
'यद्यपि राहु छादक है' यह केवल वासना से सिद्ध नहीं होता है। नहीं हो, यह तो हमारा इष्ट ही है, क्या वास
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सिद्धान्त पक्ष यह है कि — दिनार्ध के बाद (सूर्य के राध्युन्मुख होने के कारण) रात्रि, और राध्यार्ध के
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कर्क में सूर्य जाते हैं तो देवों का अपराह्ण होता है, अतः उस (अपराह्ण) का फल रात्रिवत् मानते हैं। एवं
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इसी हेतु से कितने (वैष्णव और निम्बादित्यसम्प्रदाय के लोग) दशमी में पूर्वकापालिक वेध मानते हैं। अर्था
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अतः उपरोक्त हेतुओं से राहु विद्यमान है। दूसरे हेतुओं से क्या प्रयोजन? और आकाश में रुधिरबिन्दु के समा
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जो ग्रहण में स्थित रहता है उसकी गति प्रत्यक्ष देखने में नहीं आती, तो भी वही (अनुमान से सिद्ध गति) ग्