HomeLibraryVivaha VrindavanaCh.8 · Shadvarga (The Six-Fold Divisional Chart System)
Vivaha Vrindavana · Chapter 8

Shadvarga (The Six-Fold Divisional Chart System)

26
Verses
0
Translated

All 26 verses

1
जैसे सायन-सूर्य पर से चरसाधन कर दिनमान बनाया जाता है उसी प्रकार सायन लग्न से चर बनाकर रात्र्यर्ध को
2
लग्न को चतुर्थ में, चतुर्थ को सप्तम में, सप्तम को दशम में और दशम को प्रथम लग्न में घटाकर प्रत्येक शे
3
सन्धि में (अर्थात् सन्धितुल्य) ग्रह निष्फल होता है (अर्थात् शुभ वा अशुभ कुछ भी फल नहीं देता है)। तथा
4
भावस्पष्ट बनाने से भावकल्पनावश जो गुणप्राप्त हो उसका स्वीकार नहीं करना चाहिये। और भावकल्पनावश जो दोष
5
क्योंकि — दोष पाक्षिक (अल्प अंश से) भी हो तो त्याज्य है। और जो गुण सर्वसम्मत हो उसका ग्रहण करना चाहि
6
विवाहकालिक इष्ट समय में — गत संक्रान्तिका से इष्टकाल पर्यन्त जितने दिनादि हो उसमें गत और अभिमत संक्र
7
रात्रि में इष्टकाल बनाना हो तो सूर्य में ६ राशि जोड़ देना, और दिन में केवल सूर्य ही में अयनांश जोड़क
8
तात्कालिक सूर्य को लग्न में घटाकर शेष के अंशादि बनाकर उसमें १५ के भाग देने से गतकाल होरा होती है। सू
9
लग्न में अधिक शुभग्रह के वर्ग हो तो पापग्रह की होरा निष्फल होती है। एवं शुभग्रह के दिन में भी पाप हो
10
दक्षिण गोल में सूर्य हो तो चरपल और देशान्तर पल के योग, और उत्तर गोल में अन्तर करके जो हो, दक्षिण गोल
11
वारप्रवेश समय से इष्ट घड़ी को दूना करके उसमें ५ का भाग देने से लब्धि काल होरा होती है, इसमें भी सूर्
12
गण्डान्त, वेशता (विषकुम्भ), और संक्रान्ति से पूर्व-पश्चात् १६-१६ घड़ी, अर्धयाम, व्यतीपात, भद्रा (विष
13
ग्रह वा भाव जिसका षड्वर्ग विचार करना हो उसके राशि को छोड़कर केवल अंश को १, १, ३, २ से गुनाकर पृथक् प
14
मंगल, शुक्र, बुध, चन्द्र, रवि, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शनि और बृहस्पति ये क्रम से मेषादि १२ राश
15
सम राशि में प्रथम चन्द्र की, तब सूर्य की, और विषम राशि में प्रथम रवि की, तब चन्द्र की होरा होती है।
16
३३ को दो स्थान में रखकर ६० से गुना करके पृथक् पृथक् चन्द्रमा और सूर्य के गत्यन्तर, चन्द्रमा की गति औ
17
मंगलादि ग्रहों की विम्बकला को भी ६० से गुना करके अपनी अपनी गतिकला से भाग देने से लब्धि घट्यादिक उन ग
18
सायन सूर्य में १ राशि जोड़ने पर उसके अंशों में २ राशियों के अंश (६०) से भाग देकर लब्धि वसन्तादि ऋतु
19
उन ऋतुओं की सन्धि ६६ घटी होती है। यदि विषुव (मेष, तुला) और अयन (कर्क, मकर) सम्बन्धी हो तो १३२ घटी अर
20
तिथि, नक्षत्र, योग की सन्धि में विवाह होने से स्त्री शोक में प्राप्त होती है। विवाह समय में सन्धिसन्
21
शूल, वैशृत, वारीयस् योगों की, तथा ५, १०, १५ तिथियों की, रेवती, ज्येष्ठा, आश्लेषा नक्षत्रों की जो सन्
22
नक्षत्र सन्धि में १ घटी १५ पल, योगसन्धि में १ घटी ८ पल, तिथिसन्धि में १ घटी २० पल पूर्व और पश्चात् त
23
अमावास्या अपने आगे और पीछे की दोनों तिथि (चतुर्दशी और प्रतिपदा) सहित विवाह में मङ्गलप्रद नहीं होती ह
24
यह चन्द्रमा प्रतिपदा के समय उदित होता है इसलिये द्वितीया में वर्धनशील होने के कारण प्रशस्त माना जाता
25
जन्ममास, जन्मतिथि और जन्मनक्षत्र में बृहत् मङ्गल (चूडाकरण, उपनयन, विवाह आदि) शुभ नहीं कहा गया है। अध
26
इस प्रकार उपरोक्त गुण और दोष दिव्यदृष्टि वाले मुनियों ने जो कहा है, उन मुनियों के मत और जन्म समय को