Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
भावस्पष्ट बनाने से भावकल्पनावश जो गुणप्राप्त हो उसका स्वीकार नहीं करना चाहिये। और भावकल्पनावश जो दोष हो वह तत्त्वतः त्याज्य है। जैसे — लग्नकुण्डली में सप्तम रवि (सूर्य) अशुभ कहा गया है? वह यदि भावकुण्डली के अनुसार अष्टम (अष्टम होने से शुभ) भी हो तथापि वह त्याज्य ही है ॥ ४ ॥
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