HomeLibraryVivaha VrindavanaCh.1 · Nakshatra Shuddhi Prakarana (Purification of Nakshatras)
Vivaha Vrindavana · Chapter 1

Nakshatra Shuddhi Prakarana (Purification of Nakshatras)

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[टीकाकार सीतारामझा का मंगलाचरण — श्रीकृष्ण के चरणों में हृदय समर्पित कर, कोकिलाओं के नित्य विहार करन
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चलते और लौटते हुए नेत्र प्रान्तों की शोभा है जिसमें ऐसा श्री (लक्ष्मी) और नारायण का प्रथम समागम आप ल
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गर्ग, भृगु, भागुरि, रेभ्य इन सब मुनियों के वचनों के तत्त्व संकलन करके वराहमिहिर, श्रीपति आदि आचार्यो
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मूल, वसंशक (तीनों उत्तरा, रोहिणी), अनुराधा, मृगशिरा, मूल, रेवती, हस्त, मघा, और स्वाती ये ११ नक्षत्र
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प्राचेतस मुनि ने पूर्वफाल्गुनी को विवाह में शुभ कहा है, परन्तु उसमें विवाहिता सीता ने सुख का सेवन नह
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वात्स्य आदि अन्य आचार्यों ने वर्षा और वसन्त ऋतु, कार्तिक तथा मार्गशीर्ष में विवाह विहित कहा है। परन्
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५ याम्योत्तर, ५ पूर्वापर और दो दो रेखा कोण में न्यास करे। इस प्रकार पञ्चशलाका चक्र में कोण वाली दूसर
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उक्त पञ्चशलाका चक्र में जिस रेखा में ग्रह हो उस रेखा के अग्रगत विवाहविहित सम्पूर्ण नक्षत्र को वेधित
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उत्तराषाढ के चतुर्थ चरण और श्रवण के आदि में पञ्चदशांश अभिजित् नक्षत्र का मान है। विवाह से भिन्न अन्य
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उपरोक्त वेधविधि द्वितीय और तृतीय चरण में तथा प्रथम और चतुर्थ चरण में परस्पर समझना। पापग्रह से वेधित
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पापग्रह जिस नक्षत्र को छोड़ दिया हो, जिसमें जाने वाला हो तथा जिसमें वर्तमान हो ये तीनों नक्षत्र तथा
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सूर्य अपने नक्षत्र से १२वाँ, और राहु २०वाँ, पूर्ण चन्द्रमा ७वाँ, मङ्गल ३रा, बुध २२वाँ, बृहस्पति ६ठा,
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इस प्रकार ग्रहों के सम्मुखलत्ता होने पर भी मुनिगणों ने जो पृष्ठलत्ता दोष कहा वह नक्षत्र के उत्तरार्ध
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शुभग्रह से लत्तित नक्षत्रों में बल के ह्रास होने के कारण उन नक्षत्र का शुभ फल नहीं होता है। तथा पापग
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एक ऊर्ध्वाधर रेखा को १३ तिरछी रेखा से वेध करने पर खाजूर नामक चक्र होता है। इस चक्र में आगे कहे हुए श
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व्याघातादि दुष्टयोग की संख्या में १ जोड़कर आधा करने से जो संख्या हो वही शीर्ष नक्षत्र होता है। यदि आ
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श्रीपति आदि अन्याचार्य गतगम्यक्षेत्र हेतु (पादवेध) को छोड़कर समस्त नक्षत्र को ही त्याज्य कहे हैं। क्
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पापग्रह से ६ राशि अन्तर पर जो नक्षत्र हो वह अनिष्ट है। इस प्रकार कितने आचार्यों की विशेषोक्ति है। पर
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जैसे विषयुक्त शर से मारे हुए हरिण के क्षत स्थल को छोड़कर अन्य समस्त देह का मांस प्रशस्त माना जाता है
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हर्षण, साध्य, शूल, गण्ड, व्यतीपात और वैधृति इन ६ योगों के अन्त में जो नक्षत्र रहता है उस नक्षत्र पर
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गण्ड में ६, शूल में ५, विष्कम्भ में ३, चर में ३, व्याघात में ९, और अतिगण्ड में ६ घटी आरम्भ से त्याज्
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जिस नक्षत्र में राहु देख पड़े (अर्थात् ग्रहण हो) और जिस नक्षत्र में मंगलादि ५ ग्रहों में किसी दो का
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जिस नक्षत्र में उत्पात हुआ हो उसको और पापग्रह से व्यक्त नक्षत्र को यदि चन्द्रमा दोबारा भोग करे तो वह
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ध्रुव योग के तृतीयांश अवशेष रहने पर और ऐन्द्रयोग के तृतीयांश बीतने पर क्रान्तिसाम्य का सम्भव होता है
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जो नक्षत्र वेधादि दोष रहित देदीप्यमान कान्तियुत हों उनमें वधू के पाणिग्रहण करने से वर अतिशय सुख का भ