Vivāha Vṛndāvana
Chapter 1 · Nakshatra Shuddhi Prakarana (Purification of Nakshatras) · Verse 18
Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
Translations
Hindi

जैसे विषयुक्त शर से मारे हुए हरिण के क्षत स्थल को छोड़कर अन्य समस्त देह का मांस प्रशस्त माना जाता है, इसी दृष्टान्त से दूसरे आचार्यों ने पापग्रह के पाद वेध मात्र को त्याज्य कहा, समस्त नक्षत्र को नहीं। परन्तु उसी दृष्टान्त से उन आचार्यों के अपने पक्ष की ही हानि हुई — क्योंकि जैसे किसी एक अङ्ग में भी शर से विद्ध होने पर हरिण समस्त शरीरस्थ प्राणों से विमुक्त हो जाता है, उसी प्रकार पापग्रह से चरणवेध होने पर भी समस्त नक्षत्रों का बलरूप सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। इसलिये पापविद्ध समस्त नक्षत्र को ही त्याग देना चाहिये।

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