If the 12th and the 2nd houses be occupied by the Moon and the Sun, being conjoined with or aspected by Saturn and Mars, the person born will suffer from eye-disease. The 3rd and the 11th houses and Jupiter, if associated with or aspected by Saturn and Mars, will cause ear-disease to the native. Mars (a malefic) in the 5th house in conjunction with the lord of the 6th or the 8th house will make the native suffer from belly-ache. Similarly the lords of the 8th and the 6th houses, if posited in the 7th and the 8th along with malefics, will bring about rectal disease. Venus under the above conditions will make the person born suffer from a disease in the private parts (venereal disease).
अब रोग के कुछ अन्य योग बताये जाते हैं: (१) यदि चन्द्रमा और सूर्य बारहवें या दूसरे स्थान में हों और उनको मंगल और शनि देखते हों तो नेत्र रोग होता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि सूर्य चन्द्र दोनों एक साथ या एक दूसरे घर में हों और उनको मंगल और शनि दोनों पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो संभवतः उस आँख से दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जाय। दूसरा स्थान दाहिने नेत्र का है इस कारण दाहिने नेत्र में रोग होगा। ऊपर जो योग बताया गया है वह यदि बारहवें घर में होगा तो बायें नेत्र की दृष्टि नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों में से कोई एक — दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो और उसको शनि या मंगल देखता हो तो दूसरे में सूर्य या चन्द्र बैठने से दाहिने नेत्र का रोग होगा और बारहवें घर में सूर्य या चन्द्र बैठने से और उसको मंगल या शनि के देखने से बायें नेत्र में रोग होगा। दूसरे और बारहवें घर को नेत्र स्थान कहते हैं। नेत्र स्थान में बैठे हुए सूर्य या चन्द्र को केवल मंगल या केवल शनि देखें तो थोड़ा कष्ट और यदि मंगल और शनि दोनों देखें तो विशेष कष्ट समझना चाहिये — ऐसा हमारा अनुभव है। हमारा यह भी अनुभव है कि यदि नेत्र स्थान में सूर्य, चन्द्र न भी बैठे हों, अन्य पाप ग्रह बैठे हों या पाप ग्रह की दृष्टि हो तो भी नेत्र की दृष्टि में कमी हो जाती है। (२) यदि तीसरे और ग्यारहवें घर और बृहस्पति, मंगल, शनि से युत या दृष्ट हों तो कान का रोग होता है। तीसरे से दाहिने कान का विचार किया जाता है, ग्यारहवें से बायें कान का। सुनना (शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध इन पाँच गुणों में से) शब्द से सम्बन्ध रखता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह पाँच तत्त्व हैं। सूर्य और मंगल ग्रह का अग्नि तत्त्व, चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्त्व, बुध का पृथिवी तत्त्व, शनि का वायु तत्त्व और बृहस्पति का आकाश तत्त्व है। शब्द गुण का अधिष्ठाता आकाश तत्त्व है। आकाश तत्त्व बृहस्पति से सम्बन्धित होने के कारण यह कहा गया है कि यदि बृहस्पति मंगल, शनि से (मंगल से या शनि से या शनि, मंगल दोनों से) पूर्ण दृष्टि से देखा जाता हो, या मंगल, शनि के साथ हो तो कान के रोग अथवा बहरापन होता है। यहाँ तारतम्य से यह विचार कर लेना चाहिए कि तृतीय और एकादश घर जितने निर्बल होंगे और जितनी अधिक पाप दृष्टि इन दोनों पर पड़ेगी — या जितने अधिक पाप ग्रहों के साथ ये तथा बृहस्पति (शब्द गुण का अधिष्ठाता होने के कारण) होंगे उतना ही तीव्र (अधिक) कान का रोग होगा। मंगल पित्त प्रधान है इस लिए मंगल की युति या दृष्टि पित्त के कारण या फोड़ा-फूसी, रक्त स्राव आदि का रोग कान में करेगा। शनि वायु प्रधान है इस कारण, शनि जब कान के रोग उत्पन्न करेगा तो वात के कारण। वात, पित्त, कफ यही तीन दोष आयुर्वेद के हिसाब से 'त्रिदोष' हैं जिनके कुपित हो जाने से या असामञ्जस्य से शरीर में रोग होते हैं। (३) मंगल पंचम में होने से उदर रोग होता है। (कोई भी उग्र-ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु) पंचम में होने से पेट में पीड़ा करता है। पाँचवाँ स्थान पेट का है। (४) शुक्र यदि सप्तम या अष्टम स्थान में हो तो वीर्य सम्बन्धी प्रमेहादि या मूत्ररोग करता है। (५) यदि षष्ठेश या अष्टमेश, सप्तम में या षष्ठेश अष्टम में हो तो गुदा रोग होता है। सप्तम स्थान गुह्य जननेन्द्रिय प्रदेश, अष्टम गुदा का स्थान है। यहाँ पाप ग्रह बैठे हों या दुःस्थान (छठे आठवें) के स्वामी बैठे हों तो शरीर के उस भाग में रोग उत्पन्न करते हैं।
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