The person born in a Vimala Yoga will spend little and save much money. He will be good to every body. He will be happy and independent and will have a respectable profession or conduct and be renowned for his good qualities.
यदि १२वें घर का मालिक दुःस्थान में हो और अशुभ ग्रहों से युत-वीक्षित हो तो विमल योग होता है। ऐसा व्यक्ति व्यय थोड़ा करता है, उसके धन की अधिक वृद्धि होती है। ऐसा मनुष्य सुखी, स्वतन्त्र, अपने सद्गुणों के लिये विख्यात, उत्तम कार्य करने वाला होता है और सब व्यक्तियों के अनुकूल आचरण करता है। ऊपर के योगों में दो बातें बताई गई हैं — (१) भावेश दुःस्थान में हों, (२) भाव अशुभ ग्रह से युत-वीक्षित हो। यदि भावेश अशुभग्रह-युत-वीक्षित हो तो और भी दुष्ट फल होगा। फलदीपिका के टीकाकार श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने ५७वें श्लोक की टीका करते हुए लिखा है कि यदि भावेश दुःस्थान में हो और भाव अशुभ-युत-वीक्षित हो। संस्कृत के मूल श्लोक में जो 'अशुभ-संयुक्तेक्षितैर्वा क्रमात्' यह पद आये हैं वह देहली-दीपक न्याय (अर्थात् देहली पर रक्खा हुआ दीपक — जिन दो कमरों के बीच की देहली पर रक्खा होता है उन दोनों में प्रकाश करता है) से भावेश और भाव दोनों में लग सकता है अर्थात् — (i) यदि भावेश दुःस्थान में हो और अशुभग्रहों से युत-वीक्षित हो तथा भाव अशुभ ग्रहों से युत-वीक्षित हो। (ii) यदि भावेश दुःस्थान में हो और भाव अशुभ ग्रहों से युत-वीक्षित हो। वास्तव में सिद्धान्ततः — (१) भावेश का ख़राब जगह बैठना, (२) भावेश का दुष्ट ग्रहों से युत होना, (३) भावेश का पाप-ग्रहों से वीक्षित होना, (४) भाव में अशुभग्रहों का बैठना, (५) भाव का अशुभग्रहों से देखा जाना — यह पाँच बातें भाव को ख़राब करती हैं। जितनी अधिक ख़राब ग्रह स्थिति होगी उतना ही उस भाव सम्बन्धी कष्ट होगा।
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