HomeLibraryPhaladeepikaCh.6Verse 68
Phaladeepika
Chapter 6 · yogādhyāya · योगाध्याय · Verse 68
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
ऋणग्रस्त उग्रो दरिद्राग्रगण्यो भवेत्कर्णरोगी च सौभात्रहीनः ।
अकार्यप्रवृत्तो रसाभासवादी परप्रेष्यकः स्याद्दरिद्राख्ययोगे
IAST Transliteration
ṛṇagrasta ugro daridrāgragaṇyo bhavetkarṇarogī ca saubhātrahīnaḥ | akāryapravṛtto rasābhāsavādī parapreṣyakaḥ syāddaridrākhyayoge
TranslationsTwo-source verified
English

He who is born in Daridra Yoga will be loaded with debts, cruel, foremost among the poor, will suffer from ear-troubles, will be devoid of good brotherhood, will entangle himself in criminal or sinful actions, will speak indecently and will be a menial to others.

Hindi

यदि ११वें भाव का स्वामी दुःस्थान में हो तो दरिद्र-योग होता है। हमने ऊपर अनेक स्थानों पर यह लिखा है कि भावपति दुःस्थान में हो और भाव अशुभ ग्रह से युत-वीक्षित हो तो योग होगा। वास्तव में यह एक टीकाकार का मत है। मन्त्रेश्वर महाराज ने ५७वें श्लोक की प्रारम्भिक दो पंक्तियों में जो शब्द उपयोग किये हैं उनका यह अर्थ करना विशेष उपयुक्त होगा कि भावेश दुःस्थान में हो और भावेश अशुभ ग्रहों से युत-वीक्षित हो और भाव भी अशुभ ग्रहों से युत-वीक्षित हो तो विविध योग होते हैं। किन्तु इसके अपवाद हैं — यदि भाव में सर्वत्र अशुभ ग्रह होने से ख़राब योग बने तो एकादश भाव में पाप ग्रह के बैठने से दरिद्र-योग बनना चाहिये? किन्तु ज्योतिषियों का आप्तवाक्य है कि 'लाभे सर्वे प्रशस्ताः'। सारावली में भी लिखा है — 'लग्नस्थाः सुखसंस्थाः दशमस्थाश्च कारकाः सर्वे। एकादशमपि केचित् वाञ्छन्ति न तन्मतं मुनीन्द्राणाम्॥' अतः हम यही अर्थ करेंगे कि यदि एकादशेश त्रिक में हो या अशुभ ग्रहों से युत-वीक्षित हो तो दरिद्र-योग होता है। जिसकी जन्मकुण्डली में यह योग हो वह क़र्ज़दार, अत्यन्त दरिद्री, कान की बीमारी से तकलीफ़ पाने वाला, अच्छे भाइयों से हीन, दुष्कार्य करने वाला, अप्रशस्त वचन बोलने वाला, दूसरे का नौकर और दुःख उठाने वाला होता है।

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