The person who has his birth in a Mriti Yoga will be vanquished by his enemies, will have no brothers, will be devoid of shame, strength and wealth, overcome by fatigue caused by doing improper acts and will be of an excited temperament.
यदि तृतीय स्थान का स्वामी दुःस्थान में स्थित हो और तृतीय भवन और तृतीयेश अशुभ ग्रहों से युत या वीक्षित हो तो 'मृति' योग होता है। ऐसे योग में उत्पन्न मनुष्य शत्रुओं से पराजित, अनुचित कर्म करने वाला, परिश्रम से खिन्न (बहुत परिश्रम करना पड़े जिसके कारण चित्त में खेद हो) और निर्लज्ज हो। उसके बल और धन का हरण हो जाये। और उसे भाई-बहिनों का सुख न हो। ऐसे व्यक्ति का अपने ऊपर क़ाबू नहीं रहता — इस कारण ऐसे कर्म करता है जिसके लिये उसे बाद में पश्चात्ताप होता है।
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.