Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 10 · · Verse 2
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

नक्षत्र तथा लग्नशुद्धि शाक्रश्नवः क्षिप्रमृदु श्र्वोडुभि: शीषोंदये वोपचये शुभे तनों। पापंस्त्रिषष्ठायगर्त: हशभग्रहैः केन्द्रन्रिकोणाय धनत्रिसंस्थिते: ॥ २॥। अन्वयः--शाक्रश्नवः क्षिप्रम॒दु श्र्वोडुभि: शीर्षोदये वा उपचये शुभे तनौ, पापे- स्त्रिषष्ठायगते:, शुभग्रहैः केन्द्रतिकोणायधनत्रिसंस्थिते: (राजाभिषेक: शुभः स्यात्‌) ॥२॥। ज्येष्ठा, श्रवण, हस्त, अद्ववनी, पुष्य, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, रोहिणी, तीनों उत्तरा, इन नक्षत्रों में; मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक वा कुम्भ लग्न में रहते अथवा जन्मलस्न वा जन्मराशिं से तीसरी, छठी, गेरहवीं लग्न में और लग्न से तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रहों के रहते तथा लग्न, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचदें, नें गेरहवें, दूसरे, तीसरे स्थान में शुभग्रहों केरहते राजाभिषेक शुभ होता है ॥ २॥

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