Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 84
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

। रतनौ (विवाहे) दारिद्रबं स्यात्‌, दिवान्धलग्ने वंधव्यम्‌, निशान्धअन्वयः--बधि लग्ने शिशुमरणम्‌, पर्वंगे निंखिलधनानि नाशं आपु: | सर्वत्र अधिपगुरुदृष्टिभि: न दोष: (स्यात्‌ ) ॥| 5३ ॥। बहिरी लग्न में यदिं विवाह हो तों दारिद्रय होता है, जो लग्नें दिन में अन्धी कही हैं, उनमें यदि विवाह हो तो कन्या विधवा होती है, जो लगें रात्रि में अन्धी कही हैं उनमें विवाह हो तो सन्‍्तान नहीं जीती और पंग्रुसंज्ञक लग्न में विवाह हो तो धन का नाश होता है। परन्तु यदि लग्न का स्वामी या बृहस्पति लग्न को देखता हो तो उक्त दोष नहीं होता ॥| ८३ ॥ . # यदह्यपि मतान्‍्तर से ये पंग्वादि संज्ञाएँ ग्रन्थकार ने कहो हैं, परन्तु इसमें कोई प्रमाण नहीं मिलता । + हर 4८ हज विवाहप्रकरण शुभ नवांश कार्मुंकतोलिककन्यायुग्सलवे झषगे वा। यहि भवेदुपयामर्स्ताह सती खलु कन्या ॥ ८४ ॥

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