Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
अन्वयः--याततिथ्य: लग्नेन आढ्या: अंकतष्टा: नागद्बबब्धितकेंन्दुसंख्ये शेषे (सति क्रमंण) रोग:, वह्निः, राजचौरो स्थात् (तथा) मृत्युबाण: स्यात्, चर अय॑ दाक्षिणात्यप्रसिद्ध: ।। ७२ ।। शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर जितनी तिथि बीत गई हों उनमें लग्न की राशि की संख्या को जोड़कर नव का भाग देने पर यदि आठ बाकी रहें तो रोगबाण, दो बाकी रहें तो अग्नि बाण, चार शेष रहें तो राजबाण, छ: शेष रहें तोचोरबाण और एक शेष रहे तो मृत्मुबाण दोष होता है। यह विवाहादि कार्यों में अशुभ होता प्रसिद्ध है। यह बाणदोष दक्षिण देश के लोगों में है।। ७२ ।।
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