। दशयोग उक्त दश दोषों का फल वाता भ्राग्निस पच्चो ही रमरणं रुग्वज्ञवादा: क्षति- क् योगाडू: दलिते समे मनुयुतेष्योजे तु संकेडड्िते । भें दाल्रादथ संमितास्तु मनुभीरेखाः क्रमात् संलिखेठेधे$स्मिन् प्रहचन्द्रयोनं शुभद: स्थादेकरेखास्थयो: ॥। ७१॥ अन्वयः--वाता भ्राग्निम पचो रम हीरण रुग्वज्ञवादा: क्षति: (इति क्रमेण दशयोग- फलानि ज्ञेयानि) अथ समे योगाड् दलिते मन्युते ओजे [योगांके |सैके अद्धिते (सत्ति) दास्रात् भ॑ (ज्ञेयम्) अथ मनृभिः सम्मिताः: रेखा: क्रमात् संलिखत् अस्मिन् एंकरेखास्थयो: ग्रहचन्द्रयो: बेध: न शुभद: स्यात् ।। ७१॥। इन पूर्व कहे हुए दश अज्छ्ों में सेयदि शून्य शेष हों. तो विवाहकाल में वायु बहुत चले, एक शेष हो तो बादल बहुत हों, चार शेष हों तो अग्नि लगे, छः शेष हों तो राजदण्ड हो, दश शेष हों तो चोरीं हो, गेरह शेष हों तो मरण हो, पन्द्रह शेष हों तो रोग हो, अठारह शेष हों तो बिजली गिरे, उन्नीस शेष हों तो झगड़ा हो, बीस शेष हों तो हानि हो। इस कारण इन दह योगों को विवाह, देवादिप्रतिष्ठा, यज्ञोपवीत, पंसवनकम, कर्णछेद, मुण्डनादि शुभ कर्मों में त्यागना चाहिए। अब इन दर योगों का परिहार कहते हैं । पूर्व कहे हुए दश अद्धभों में सेयदि सम अड्भूबाला योग आ पड़े तो उसके दो भाग करके एक भाग में चौदह और मिलावे और यदि विषम अड्भूवाला योग आ पड़े तो उसमें एक और मिलाकर सम करे । तदनन्तर उसके दो भाग करके एक भाग में चौदह और मिलावे । तब जितनी संख्या हो अश्विनी से लेकर उतनी संख्यावाले नक्षत्र कोआड़ी चौदह लकीरों से बने हुए चक्र के आदि में लिखकर क्रम से अभिजित् सहित अटठाइस नक्षत्र रेखाओं के छोरों पर लिखे । उन नक्षत्रों में जो ग्रह स्थित हों उन्हें भी वहीं लिखे । यदि इस चक्र में किसी ग्रह और चन्द्रमा का परस्पर वेध हो तो वह अशुभ होता है, अर्थात् इस चक्र की किसी एक ही रेखा के एक छोर पर चन्द्रमा हो और दूसरे छोर मुहृत्तचिन्तामणि है| १३८ | । पर शुभ या अशुभ कोई अन्य ग्रह स्थित हो तो पूर्वोक्त दश योगों में से यह योग अति अशुभकारक होता है और यदि दूसरे छोर पर कोई ग्रह न स्थित | हो तो अशुभकारक नहीं होता । उदाहरण-यथा पूर्वोक्त दश योगांकों में से द | में चौदह और मिलाया तो उन्नीस हुए । अब अध्वनी से गिना तो उन्नीसवाँ मूल नक्षत्र हुआ और उन्हीं पूर्वोक्त दश योगों में सेगेरह संख्यावाला योग तो छः छः: है तो यहाँ एकऔर मिलाया तो बारह हुए । इनके दो भाग किये | | | | हुए । एक स्थान में चौदह और जोड़ा तो बीस हुए । अश्विनी से लेकर गिना तो बीसवाँ पूर्वाषाढ़ नक्षत्र हुआ। इन सन और विषम दोनों अद्धों सेआये हुए मूल और पूर्वाषाढ़ नक्षत्रों में सेमूल नक्षत्र को आदि में लिखकर चक्र को स्पष्ट करता हूँ। %“/53 कक सू० कक 3 2 है 20 आ6,..,.६. 5 २७ के व पक कस 5 णशु०चं ०-चि ० | कक... | बे द 8 0:७ ॑आ पक 0 पक कलद के कई): | आकर, | | | (कि द द | । ४ पृ० उ+--शु ० ५230 खपत | का 4022 रस ध०-सू ० बु० द ऊ: हक १ ११ पूछ द 8,224. 6.0| ९८५०) ०० कफ ६-० २००३ नल 4 उ० द अड अ कस रे० बु० | छ४ हक उठ 5४३ कक 0 आम क् + '+आल «के 5कल! उह कक के श० 6: के 5 758 2 आप 2 मा टक. 23720 23 2 अप 4अ ३३४० आअ०-मं० रा० 56%७३+ के ६४८०६ कट > कक मध्य 8 २६४०९३५३४६९०३४३३५० २०४३४ मिल किक - लिखे हि अाएले 5:50 5, , 557 55 &.)3. ... हु ३३. 77१0९ ०११ )032 ५5 मेशलिलक «८०० २४७४०२७३ १७५३ ४+०३५«५४४ ० है४० ०३१७ ०१५ ०२ ४०३५० कै. निकल हे. जनक कम || 227 ००: कीकफ फलज आअ० "१७४३३ ९ किन ०क -०० “7७८० ००० ००_१-2 2 ६२००२००३० 44 ४०३० 5०2 7 यश टू + श्र० लड़ 2922 ८८. ०४६० ४६०४००६६ बे नके 2० देन 5 पक नरक 4 कक. | आम अर अल । | . दस संख्यावाला अड्धू है। इसके दो भाग किये तो पाँच पाँच हुए। एक स्थान ज्येबे द द उंनपुंगर 5 परत + लत कि 7३ ब्का हैर- हे: . ० भ० हकाए जनपएफए कप १८ क22+: : “कामपट दब प 05% “घट केक | की कृ० रो० ३ ७०> २०० १०5२8 “केक ३० २०० *+ अहुऊ508 2 अल के98025 ६ 280 72% ५४ २०5३४ मृ० इस चक्र की छठी रेखा के एक छोर पर चित्रा नक्षत्र है। उसमें चन्द्रमा स्थित हैऔर दूसरे छोर पर शतभिष नक्षत्र है उसमें कोई भी ग्रह नहीं इस परस्पर वेध नहीं है। नहीं चन्द्रमा का किसी ग्रहर्बोंके साथ है । इस कारण 3 नें चित्रा नक्षत्र मेंयदि विवाह हो तो पूर्वोक्त दश योग दोष अशुभकारक हो सकता | इस दश योग का बाधक योग व्यासजी ने कहा है कि यदि हो विवाह लग्न शुक्र या बृहस्पति से दृष्ट वा युक्त हो तो दश योग नष्ट जाता हैं ॥ ७१॥
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