Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 70
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

दश दोष शशाडूसूरययक्षयुतेभंशेष॑ खे॑ भूयुगाड़्रानि दशेशतिथ्यः । नागेन्दवो ड्ेन्द्रुमिता नखाइचे:्धूवन्ति चेते दशायोगसंज्ञा: ॥ ७० ॥ अन्वयः--शशाडूसूयक्षेयुते: भशेष॑ ख॑ं भूयुगांगानि दशेशतिथ्य: नागेन्‍्दव: अंकेन्दुमिता: ॥। ७० ॥ नखाः चेत्‌ (यदि) भवन्ति च (तदा ) एते (क्रमेण )दशयोगसंज्ञा: (भवन्ति) अश्विनी से लेकर सूर्य और चन्द्रमा के नक्षत्र तक अलग-अलग गिने । फिर उन दोलों संख्याओं को जोड़कर उसमें सत्ताइस का भाग देने से यदि दन्‍्य, एक, चार, छः, दस, गेरह, पन्द्रह, अठारह, उन्नीस, बीस ये अद्धू बाकी बचें तो दोषी होते हैं, उस नक्षत्र में विवाह शुभ नहीं होता । उदाहरण--यथा उत्तराषाढ़ में चन्द्रमा और अनुराधा नक्षत्र में सूर्य स्थित है । अश्विनी से जी न्‍्फृ >> *ह <क०ककरीकल्‍न+-५ ऑन अजीत अककनान कक 2+ ह७एंआणा८ंाआआ४छ्रणछएणछाांध विवाहप्रक रण । १३७ चन्द्रमा के नक्षत्र की इक़कीस संख्या और सूर्य के नक्षत्र की सत्रह संख्या हुई । इन दोनों का जोड़ अड़तीस हुआ । इसमें सत्ताइस का भाग दिया तो बाकी गेरह बचे । उक्त रीति से यह अद्धू दोषी है, इसलिए उत्तराषाढ़ नक्षत्र में विवाह शुभ नहीं है । ये दश अच्भू गिनाये ग्ये हैं; इसलिए इनका नाम पड़ गया है ॥ ७० ॥

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