अन्य बाणदोष रसगुणशशिनागाब्ध्याब्चसंक्रान्तियातांदशकसमितिरथतष्टाडूयंदा पत्च शंषाः:। रुगनलनपचोरा मृत्युसंज्ञरच बाणो नवह॒तशरशेष शेषकक्ये संशल्यः: ॥ ७३॥ अन्वयः--रसगुणशशिनागाब्ध्याढ्यसंक्रान्तियातांशकमिति: अके: तष्टा यदा [यत्र ] पञच शेषाः: (तदा क्रमंण) रुगनलनृषचोरा: मृत्युसंज्ञ:च बाण: नवहंतशरशेष (सति) सशल्यः (स्यात्) ॥| ७३ ॥ (स्यात्), शेषकेक्ये सूर्य की स्पष्ट संक्रान्ति के भोगे हुए अंशों की संख्या को पाँच स्थान में रखकर क्रम से ६, ३, १, ८, ४ इन अंकों को जोड़कर उनमें नव का भाग देने से यदि पहिले स्थान में पाँच शेष रहें तो रोगबाण, दूसरे स्थान में पाँच शेष रहें तोअग्निबाण, तीसरे स्थान में पाँच शेष रहें तो राजबाण, चौथे स्थान में पाँच शेष रहें तो चोरबाण., पाँचवें स्थान में पाँच शेष रहें तो मृत्युवाण दोष होता है। उदाहरण--यथा सूरय्ये की स्पष्ट संक्रान्ति का एक अंश बीत गया है तो इस एक को पाँच स्थानों पर रखकर उनके नीचे क्रम से छः तीन, एक, आठ, चार ये अंक स्थापन किये और क्रम से सबको अलग-अलग जोड़ा तो सात, चार, दो, नव, पाँच ये अड्डू हुए । इनमें नव का भाग दिया तो पहिले में सात शेष, दूसरे में चार शेष, तीसरे में दो शेष, मुहत्तचिस्तामणि.._ १४० चौथे में शून्य शेष रहा । इस कारण क्रम से रोग, अग्नि, राज, चोर, ये चार बाण नहीं हुए, और पाँचवें स्थान में पाँच शेष रहे, इस कारण मृत्यु नाम का पाँचवाँ बाणदोष हुआ । इस रीति से कहे हुए बाण में काष्ठ का ही शल्य रहता है, इस कारण अति अशुभकारक नहीं होता । अब लोहे के शल्यवाला बाणदोष कहते हैं । पूर्व कहे हुए पाँचों स्थानों के शेषों के जोड़ में नव का भाग देने पर यदि पाँच शेष रहें तोवह लोहे के शल्यवाला बाणदोष होता है। यह अति अश्युभकारक होता है । उदाहरण-यथा ७ । ४ । २। ० । ५ इन पाँचों शेषों काजोड़ १८ हुआ । . इनमें ९ का भाग दिया तो शून्य शेष रहा । इस कारण अति अशुभकारक नहीं हुआ ॥ ७३ ॥
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