। सप्तशलाका चत्र में ग्रहों हारा नक्षत्रों का वेध शाक्रेज्ये शझतभानिले जलशिवे पौष्णायंमक्षें वसुदीश वंह्वसुधांशभे हयभगे सार्पानुराधे मिथः। हस्तोपान्तिमभे विधातृविधिभ मूलादितो त्वाष्ट्रभाजाडइघ्री याम्यमघ कृशानुहरिभे विद्धे कुभद्रेखिके ॥ ५७॥ अन्बयः -कुभुद्रखिके (सप्तशलाके चक्र) शाक्रेज्ये, शंतभानिले, जलशिवें पौष्णाय॑मक्षें, वसुद्दीश, वेश्वसुधांशुभे, हयभग, सार्पानुराध, हस्तोपान्तिमभे, विधातृविधिभे, मूलादिती, त्वाष्ट्रभाजांच्री, याम्यमघे, कृशान्हरिभे, मिथ: विद्धे (स्त:) ।। ५७ ॥ सात रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं केऊपर सात रेखा आड़ौ खींचने से जो आकार बन जाता है उसे संप्तशलांका चक्र कहते हैं। इस सप्तशलाका चक्र में ऊपर बाई ओर खड़ी रेखा के छोर पर क्रत्तिका नक्षत्र को स्थापित करके दाहिने क्रम सेसब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी आदि भरणीपयंत सब नक्षत्र स्थापित किये जाते हैं। तब जो एक रेखा के दोनों छोरों पर दो नक्षत्र रहते हैं उर्नक़ा परस्पर वेध होता है। यथा ज्येष्ठा और पुष्य का, शतभिष और स्वाती का, पूर्वाषाढ़ और आर्द्रा का, रेवतीं और उत्तरा- फाल्गुनी का, धनिष्ठा और विशाखा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, अश्विनी और पूर्वाफाल्गुनी का, आश्लेषा और अनुराधा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, रोहिणी और अभिजित् का, मूल और पुनवंसु का, चित्रा और पूर्वाभाद्रपद का, भरणी और मधघा का क्रृत्तिका और श्रवण का परस्पर वेध होता है। यह वेध भी ग्रह के द्वारा होता है अर्थात् एक रेखा के दोनों छोरों पर स्थित दो नक्षत्रों मेंसेकिसी एक नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वहं ग्रह उसी रेखा के दूसरे छोर पर स्थित दूसरे नक्षत्र को वेधता है । यथा ज्येष्ठा नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह पुष्य नक्षत्र को वेधता है, अथवा पुष्य ही नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह ज्येष्ठा नक्षत्र को वेधता १३० मुहत्तचिन्तामणि है । इसी तरह इस सप्तशलाका चक्र में क््रग्रह* करके वेधा हुआ नक्षत्र और शुभग्रह करके वेधा हुआ नक्षत्र का एक पाद विवाहादि शुभ कार्यों में त्यागना चाहिए; क्योंकि दीपिका ग्रन्थ में कहा है कि जिस स्त्री के विवाहकाल में सप्तशलाका चत्र में पापग्रहों वा शुभग्रहों सेचन्द्रमा विद्ध हो वह स्त्री विवाहकाल ही के वस्त्र पहने रोती हुई श्मशानभूमि को क् जाती है ॥ ५७ ॥। सप्तशलाका चक्र कृ, रो. मृ.आा. पु. पु. श्ते. भें, अ. उ. पृ. मू,ज्यै. भर. ऋरग्रहों सेविद्ध नक्षत्रों कादोष और उसका परिहार ऋशक्षाणि ऋरविद्धानि ऋ्रमुक्तादिकानि च । भकत्वा चन्द्रेण मुक्तानि शुभाहाणि प्रचक्षते ॥ ५८॥। अन्वयः--क्ररविद्धानि क्रभक्तादिकानि च ऋक्षाणि (तानि यदि) चन्द्रण भुकत्वा मक््तानि (तदा) शुभाह॑णि प्रचक्षते ॥ ५८ || जो नक्षत्र क्ररग्रहों करके पंचशलाका या सप्तशलाका चत्र में वेधे गये हों और जिनकों क्ररग्रहों नेभोग करके शीघ्र ही छोड़ दिया होऔर जिन नक्षत्रों में क्रग्रह स्थित हों और जिन नक्षत्रों में क्ररग्रह जानेवाले हों और जिन नक्षत्रों मेंभौम, देव, आन्तरिक्ष, इन तीन प्रकार के उत्पातों में से कोई उत्पात हुआ हो, वे सब नक्षत्र शुभ नहीं होते ।इसलिए उन नक्षत्रों में विवाहादि शुभ कार्य नहीं करना चाहिए और उन्हीं नक्षत्रों कोयदि चन्द्रमा ने भोग करके छोड़ दिया हो तो शुभ हो जाते हैं अर्थात् एक महीने के बाद वे सब नक्षत्र शुभ कार्य करने के लिए शुभ हो जाते हैं ॥ ५८॥। । जातेहैंहैं।.. कहेजाते पापप्रह कहे तथापापभ्रह क्रतथा येक्रर कैतु ये ओरकैतु राहुऔर शनैश्चर, राहु मजजल,शनैश्चर, चन्द्रमा,मल, क्षीणचन्द्रमा, $स्,क्षीण “7 *सूर्य, ननक"पे सेक्शन #०्साकताक्रज ह>ेक विधाहप्रकरण १३१ लत्तादोष ज्ञराहुपूर्णन्दुसिताः स्वपृष्ठे भ॑ सप्तगोजातिशरंभितं हि। संलत्तयन्तेषक शनीज्यभौमाः सूर्याष्टतर्काग्निसितं पुरस्तात् ॥ ५९ ॥॥ अन्वयः--ज्ञ राहुपूर्णेन्दुसिता: स्वपृष्ठे सप्तगोजातिशरेमितं भं संलत्तयन्ते । (तथा) अकंशनीज्यभौमा: पुरस्तात् (अग्ने) सूर्याष्टतर्काग्निमितं भं संलत्तयन्ते ॥ ५७ ॥
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