। । जातेहैंहैं।.. कहेजाते पापप्रह कहे तथापापभ्रह क्रतथा येक्रर कैतु ये ओरकैतु राहुऔर शनैश्चर, राहु मजजल,शनैश्चर, चन्द्रमा,मल, क्षीणचन्द्रमा, $स्,क्षीण “7 *सूर्य, ननक"पे सेक्शन #०्साकताक्रज ह>ेक विधाहप्रकरण १३१ लत्तादोष ज्ञराहुपूर्णन्दुसिताः स्वपृष्ठे भ॑ सप्तगोजातिशरंभितं हि। संलत्तयन्तेषक शनीज्यभौमाः सूर्याष्टतर्काग्निसितं पुरस्तात् ॥ ५९ ॥॥ अन्वयः--ज्ञ राहुपूर्णेन्दुसिता: स्वपृष्ठे सप्तगोजातिशरेमितं भं संलत्तयन्ते । (तथा) अकंशनीज्यभौमा: पुरस्तात् (अग्ने) सूर्याष्टतर्काग्निमितं भं संलत्तयन्ते ॥ ५७ ॥ बुध, राहु, पूर्ण चन्द्रमा, शुक्र ये ग्रह क्रम सेअपने पिछले सातवें, नवें, बाइसवें, पाँचवें नक्षत्र को लतिआते हैं अर्थात् बुध जिस नक्षत्र में स्थित हो उससे पिछले सातवें नक्षत्र को, राहु नवें नक्षत्र को, पूर्ण चन्द्रमा बाइसवें नक्षत्र कोऔर शुक्र पाँचवें नक्षत्र कोलात से मारता है। परन्तु राहु सदा वक्ती रहता है। इसलिए यदि वह अश्विनी सक्षत्र में स्थित हो तो उसका पिछला नवाँ नक्षत्र ब्लेषा होता है। सूर्य, शनेरचर, बृहस्पति, मज्जल, ये ग्रह क्रम सेअपने अगले बारहवें, आठवें, छठे, तीसरे नक्षत्र को लतिआते हैं, अर्थात् सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित होता है उससे अगले बारहवें नक्षत्र को, शनैश्चर आठवें नक्षत्र को, बृहस्पति छठे नक्षत्र कोऔर मड्भल तीसरे नक्षत्र विवाह नहीं करना को लात से मारता है | प्रयोजन यह हैंकि इन नक्षत्रों में चाहिए; क्योंकि सूर्य की लत्ता धन का नाश और चन्द्रमा, मर्जुल, बुध, राहु इन ग्रहों की लत्ता वर-कन्या का नाश और बृहस्पति की लत्ता बंधु का नाश और शुक्र की लत्ता कार्य का नाश करती है, ऐसा वराहजी ने कहा है ॥ ५९॥
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.