। ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध वेधोउन््योन्यमसी विरिड्च्यभिजितोर्याम्यानुराधकक्षेयो- बिश्वेन्द्रोहे रिपिव्ययोग्रहकृतो.. हस्तोत्तराभाद्रयो: । स्वातीवारुणयोभंवेन्नि ऋतिभादित्योस्तथोपान्त्ययोः खेटे तत्र गते तुरीयचरणाद्योर्वा तृतीयद्यों: ॥ ५६॥ अन्वयः--विरिज्च्यभिजितो:, . याम्यानुराधक्ष॑यो:, .विश्वेन्द्रो, हरिपित्ययो:, ग्रहक्नतः वेध: हस्तोत्तराभाद्रयो:, स्वातीवारुणयो:, निऋतिभादित्यो:, तथा उपान्त्ययो: भवेत् । तत्न गते खेटे तुरीयचरणाद्यो: वा (तथा) तृतीयद्यो: वेधः भवेत् ॥ ५६ |। पाँच रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं के ऊपर पाँच आडी रेखा और चारों कोनों में दो-दो तिरछी रेखा खींचे, तबजो आकार बन जाता है, उसे पड्च- शलाका चक्र कहते हैं। इस चक्र में ऊपर बाई ओर के कोने में खींची हुई दूसरी रेखा के छोर पर क्त्तिका नक्षत्र स्थापित करके फिर दाहिने क्रम से त सब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी से लेकर भरणी पर्यन्त सब नक्षत्र स्थापि उन किये जाते हैं। तब एक रेखा के दोनों छोरों पर जो नक्षत्र रहते हैं ् दोनों का परस्पर वेध होता है। उदाहरण--यथा रोहिणी और अभिजित श्रवण का, भरणी और अनुराधा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, शतभिष का, और मघा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, स्वाती और है । मूल और पुनव॑ंसु का, उत्तराफाल्गुनी और रेबती का परस्पर वेध होता दो नक्षत्रों में परन्तु यह वेध ग्रहकृत होता है, अर्थात् एक रेखा में स्थित यथा रोहिणी से किसी एक में जो ग्रह स्थित हो वह दूसरे को वेधता है। में कोई ग्रह स्थित हो तो वह अभिजित् को वेधता है और अभिजित् में कोई ग्रह स्थित हो तो वह रोहिणी को वेधता है। ऐसा ही वेध सब नक्षत्रों में जानना चाहिये । इसी चक्र में पाद-बेध भी कहते हैं । उसकी रीति यह उनमें है कि एक रेखा में स्थित जिन दो नक्षत्रों कापरस्पर वेध होता है स्थित से कसी नक्षत्र केचौथे पाद में ग्रह स्थित होतो वह उसी रेखा में दूसरे नक्षत्र केपहिले पाद को वेधता है, यदि तीसरे पाद में स्थित हो तो दूसरे पाद को और दूसरे पाद में स्थित हो तो तीसरे पाद्र को और पहिले ै विवाहप्रकरण १२९ पाद में स्थित हो तो चौथे पाद को वेक्षता है। यथा रोहिणी के पहिले पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के चौथे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के चौथे पांद में स्थित ग्रह अभिजित के पहिले पाद को वेधता है। इसी तरह अन्यत्र भी पादवेध जानना चाहिए ॥ ५६ ॥
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.