ज्येष्ठा, रेवती और आइलेषा में अन्त के दो दण्ड तथा मूल, अद्विनी और मघा में आदि के दो दण्ड गंडान्त कहा जाता है। अर्थात् रेवती-अश्विनी होता आश्लेषा-मघा, ज्येष्ठा-मूल इन नक्षत्रों कीसन्धि में चार-चार दंड गंडान्त धन है । कक, वृश्चिक और मीन लग्न में अन्त का आधा दण्ड तथा सिंह, और मेष में आदि का आधा दण्ड गंडान्त है। अर्थात् मीन-मेष, कक-सिह, ी, वृश्चिक-धनु इन लग्नों की सन्धि में एक-एक दंड गंडान्त होता है। पञ्चम दशमी, पूर्णणासी और अमावास्या में अंत का एक दण्ड तथा परीवा, छठि और एकादशी में आदि का एक दण्ड गंडान्त होता है । अर्थात् पूर्णमासीकी परीवा, अमावास्या-परीवा, पंचमी-छंठि, दह्यमी-एकादशी, इन तिथियों सन्धि में दो-दो दंड गंडान्त होता है! गण्डान्त में विवाहादि शुभ कार्य न करना चाहिए । यदि अज्ञान से विवाह किया जाता है तो स्त्री शोक करने- वाली, वन्ध्या अथवा मृतवत्सा होती है। अभिजित् *संज्ञक मुहृत्त में विवाहादि शुभ कार्य करे तो गंडान्त दोष नहीं होता ॥| ४३ ॥ कतंरी दोष लग्नात्पापावज्वनजू व्ययार्थस्थो यदा तदा। कतंरी नाम सा ज्ञेया मृत्युदारिद्रशशोकदा ॥ ४४ ॥ नाम अन्वयः--यदा ऋज्वनजू पापौ लग्नात व्ययार्थस्थी (स्याताम्) तदा कतेरी ज्ञेया । सा मृत्युदारिद्रभशोकदा (भवति) ॥ ४४ ॥
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