Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 44
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

ज्येष्ठा, रेवती और आइलेषा में अन्त के दो दण्ड तथा मूल, अद्विनी और मघा में आदि के दो दण्ड गंडान्त कहा जाता है। अर्थात्‌ रेवती-अश्विनी होता आश्लेषा-मघा, ज्येष्ठा-मूल इन नक्षत्रों कीसन्धि में चार-चार दंड गंडान्त धन है । कक, वृश्चिक और मीन लग्न में अन्त का आधा दण्ड तथा सिंह, और मेष में आदि का आधा दण्ड गंडान्त है। अर्थात्‌ मीन-मेष, कक-सिह, ी, वृश्चिक-धनु इन लग्नों की सन्धि में एक-एक दंड गंडान्त होता है। पञ्चम दशमी, पूर्णणासी और अमावास्या में अंत का एक दण्ड तथा परीवा, छठि और एकादशी में आदि का एक दण्ड गंडान्त होता है । अर्थात्‌ पूर्णमासीकी परीवा, अमावास्या-परीवा, पंचमी-छंठि, दह्यमी-एकादशी, इन तिथियों सन्धि में दो-दो दंड गंडान्त होता है! गण्डान्त में विवाहादि शुभ कार्य न करना चाहिए । यदि अज्ञान से विवाह किया जाता है तो स्त्री शोक करने- वाली, वन्ध्या अथवा मृतवत्सा होती है। अभिजित्‌ *संज्ञक मुहृत्त में विवाहादि शुभ कार्य करे तो गंडान्त दोष नहीं होता ॥| ४३ ॥ कतंरी दोष लग्नात्पापावज्वनजू व्ययार्थस्थो यदा तदा। कतंरी नाम सा ज्ञेया मृत्युदारिद्रशशोकदा ॥ ४४ ॥ नाम अन्वयः--यदा ऋज्वनजू पापौ लग्नात व्ययार्थस्थी (स्याताम्‌) तदा कतेरी ज्ञेया । सा मृत्युदारिद्रभशोकदा (भवति) ॥ ४४ ॥

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