पापयदि पापग्रह मार्गीं होकर लग्त से बारहवें स्थान में और दूसरा कहते ग्रह वक्री; होकर लग्न से दूसरे स्थान में स्थित हो तो इसे कतेरी दोष देनेहैं। विवाहादि शुभ कार्यों में कर्तरी दोष मृत्यु, दारिद्रथ और शोक ं स्थान वाला होता है । ऐसे ही कोई पापग्रह मार्गी होकर चन्द्रमा से बारहवे हो तो में और दूसरा पापग्रह वक्री होकर चन्द्रमा से दूसरे स्थान में स्थित इसे भी कतैरी कहंते हैं । यह भी पूर्वोक्त फल देनेवाली होती है । इसी रीति से सब भावों की कतंरी होती हैं ॥ ४४ ।। । ेकेल। लोल्नकाला [पीछेको'लौटने ला। | [पीछे बला चलनेवा फ्लोकोक्इल कहेंगेली । [आंगें ्षाज् #आगगे “एणएणएयगूप विवाहप्रकरण १२३ संग्रह «दोष चन्द्रे सुर्यादिसंयुक्ते दारिद्रयं मरणं शुभम् । सोख्यं सापत्न्यवराग्ये पापद्ययुते मृतिः ॥ ४५॥ अन्वयः--चन्द्रे सूर्यादिसंयुक्ते दारिद्रयं, मरण, शुभं, सौख्यं (स्यात) सापत्न््यवराग्ये (भवतः) तथा पापद्ययूते (चन्द्रे) मृति: स्थात् ॥ ४५ ॥ विवाहकाल में चन्द्रमा यदि सूर्य के साथ होतो स्त्री-पुरुष दरिद्र होते हैं, मंगल के साथ होतो दोनों की मृत्यु, बुध के साथ हो तो शुभ, बृहस्पति के साथ हो तो सुख और शुक्र के साथ हो तो स्त्री केसौत आती है तथा दनश्चर संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष में प्रीति नहीं होती है। यदि चन्द्रमा दो, तीन अथवा कई पापग्रहों से संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष की मृत्यु होती है । नारदजी ने बुध के योग में सनन््तान-हानि, बृहस्पति के योग में भाग्य-हानि, दनेदचर के योग में संन्यास, राहु के योग में स्त्री-पुरुष का परस्पर झगड़ा और केतु के योग में सदा कष्ट वा दरिद्रता कहा है। यदि चन्द्रमा अपनी उच्च राशि में, अपने मित्र की राशि में अथवा अपनी राशि में स्थित होकर शुभग्रह-संयुक्त होतो शुभफेलकारक और यदि इससे विपरीत हो तो अशुभफलकारक होता है ॥ ४५ ॥
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