। अन्वयः--भृत्यधनिभत् पुरादिसद्भांत् पूर्व चेत् (यदि) सेव्याधमर्णयुवतीनगरादिभ॑ (भवंत्) तदा सेवाविनाशधननाशनंभत् नाशग्रामादिसौख्यहुत् इदं क्रमश: प्रदिष्टम ॥। ४२ ।। यदि स्वामी के जन्मनक्षत्र से सेवक का जन्मनक्षत्र दूसरा हो तो सेवा का नाश होता है । ऋण लेनेवाले के जन्मनक्षत्र से ऋण देनेवाले का जन्मनक्षत्र दूसरा हो तो दिया हुआ धन फिर नहीं मिलता । पत्नी के जन्मनक्षत्र से पति का जन्मनक्षत्र दूसरा हो तो पति का नाश होता है । गाँव के नक्षत्र से बसने- वाले का जन्मनक्षत्र दूसरा हो तो उस गाँव में बसने से कभी सुख नहीं होता ॥| ४२ ॥ गण्डान्त दोष ज्येष्ठावोष्ण भसापं भान्त्यघटिकायुग्म॑ च मूलाश्विनीपिश्यादों घटिकाहयं निगदितं तद्भूस्य गण्डान्तकस् । कर्काल्यण्डज भान्ततो5द्धघटिका सिहाइवमेषादिगा पूर्णान्ले घटिकात्मक त्वशुभदं नन््दातिथेश्चादिसस् ॥ ४३ ॥ १२२ मुहत्तचिन्तामाणि अन्वयः--ज्येष्ठापौष्णभसापैभान्त्यघटिकायुग्म॑ च (तथा) मूलाश्विनीपित्यादो वघटिकाद्रयं तद्भस्य गण्डान्तकं निगदितम् । कर्काल्यण्डजभान्ततः अर्द्धघटिका, सिहाश् मेषादिगा (अद्धंघटिका) तथा पूर्णान्ते घटिकात्मक॑ च (तथा) नन््दातिथे: आदिमघटिकात्मकं गण्डान्तं अशुभदं (भवेत्) ॥ ४३ ॥
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