नक्षत्रों की पूर्वांयोगि आदि संज्ञा और उनका फल पौष्णेशशाक्राद्रससुर्य नन््दा: पूर्वाद्धमध्यापरभागयुग्मम् । भर्ता प्रियःप्राग्युजिभे स्त्रियाः स्यान्मध्ये द्योः प्रेमपरे प्रिया स्त्री ॥ ४१॥ शशाक्रात् रससूर्यननदा: (क्रमात्) पूर्वाधमध्यापरभागयुग्म॑ (स्यात्) अन्वयः--पौष्णे प्राग्यूजिभे स्त्रिया: भर्ता प्रियः स्थात् । मध्ये द्यो: प्रेम (भवतति) परे (भर्तुं:) स्त्री प्रिया भवति ॥ ४१॥। । ' के बिवाह प्रकरण १२१ रेवती नक्षत्र सेलेकर छः, अर्थात् रेवती, अश्बिनी, भरणी, - क्ृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, इन नक्षत्रों को पूर्वार्क्डयोगि कहते हैं। आर्द्रा सेलेकर बारह, अर्थात् आर्द्रों, पुनवंसु, पुष्य, आइलेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा इन नक्षत्रों कोमध्ययोगि कहते हैं । ज्येष्ठा सेलेकर नव, अर्थात् ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद इन नक्षत्रों को अपरभागयोगि कहते हैं ।यदि पहिले-पहिल पुरुष-स्त्री का समागम पूर्वाद्धयोगि नक्षत्रों में हो तो स्त्री को स्वामी प्रिय होता है । मध्ययोगि नक्षत्रों में हो तो स्त्री-पुरुष दोनों में परस्पर प्रीति होती हैऔर अपरभागयोगि नक्षत्रों में होतो स्वामी को स्त्री प्यारी होती है ॥। ४१ ॥। स्वामी ओर सेवक के जन्मनक्षत्र का विचार सेव्याधमर्णयुवतीनगरादिभं चेत् पू्वहि भुत्यथधनिभत॒ पुरादिसद्भधात् । सेबाधिनाशधननाशनभत् नाशग्रामादिसोख्यहृदिद ऋमशः प्रदिष्टम् ॥ ४२ ॥। अन्वयः--भृत्यधनिभत् पुरादिसद्भांत् पूर्व चेत् (यदि) सेव्याधमर्णयुवतीनगरादिभ॑ (भवंत्) तदा सेवाविनाशधननाशनंभत् नाशग्रामादिसौख्यहुत् इदं क्रमश: प्रदिष्टम ॥। ४२ ।। यदि स्वामी के जन्मनक्षत्र से सेवक का जन्मनक्षत्र दूसरा हो तो सेवा का नाश होता है । ऋण लेनेवाले के जन्मनक्षत्र से ऋण देनेवाले का जन्मनक्षत्र दूसरा हो तो दिया हुआ धन फिर नहीं मिलता । पत्नी के जन्मनक्षत्र से पति का जन्मनक्षत्र दूसरा हो तो पति का नाश होता है । गाँव के नक्षत्र से बसने- वाले का जन्मनक्षत्र दूसरा हो तो उस गाँव में बसने से कभी सुख नहीं होता ॥| ४२ ॥ गण्डान्त दोष ज्येष्ठावोष्ण भसापं भान्त्यघटिकायुग्म॑ च मूलाश्विनीपिश्यादों घटिकाहयं निगदितं तद्भूस्य गण्डान्तकस् । कर्काल्यण्डज भान्ततो5द्धघटिका सिहाइवमेषादिगा पूर्णान्ले घटिकात्मक त्वशुभदं नन््दातिथेश्चादिसस् ॥ ४३ ॥ १२२ मुहत्तचिन्तामाणि अन्वयः--ज्येष्ठापौष्णभसापैभान्त्यघटिकायुग्म॑ च (तथा) मूलाश्विनीपित्यादो वघटिकाद्रयं तद्भस्य गण्डान्तकं निगदितम् । कर्काल्यण्डजभान्ततः अर्द्धघटिका, सिहाश् मेषादिगा (अद्धंघटिका) तथा पूर्णान्ते घटिकात्मक॑ च (तथा) नन््दातिथे: आदिमघटिकात्मकं गण्डान्तं अशुभदं (भवेत्) ॥ ४३ ॥ ज्येष्ठा, रेवती और आइलेषा में अन्त के दो दण्ड तथा मूल, अद्विनी और मघा में आदि के दो दण्ड गंडान्त कहा जाता है। अर्थात् रेवती-अश्विनी होता आश्लेषा-मघा, ज्येष्ठा-मूल इन नक्षत्रों कीसन्धि में चार-चार दंड गंडान्त धन है । कक, वृश्चिक और मीन लग्न में अन्त का आधा दण्ड तथा सिंह, और मेष में आदि का आधा दण्ड गंडान्त है। अर्थात् मीन-मेष, कक-सिह, ी, वृश्चिक-धनु इन लग्नों की सन्धि में एक-एक दंड गंडान्त होता है। पञ्चम दशमी, पूर्णणासी और अमावास्या में अंत का एक दण्ड तथा परीवा, छठि और एकादशी में आदि का एक दण्ड गंडान्त होता है । अर्थात् पूर्णमासीकी परीवा, अमावास्या-परीवा, पंचमी-छंठि, दह्यमी-एकादशी, इन तिथियों सन्धि में दो-दो दंड गंडान्त होता है! गण्डान्त में विवाहादि शुभ कार्य न करना चाहिए । यदि अज्ञान से विवाह किया जाता है तो स्त्री शोक करने- वाली, वन्ध्या अथवा मृतवत्सा होती है। अभिजित् *संज्ञक मुहृत्त में विवाहादि शुभ कार्य करे तो गंडान्त दोष नहीं होता ॥| ४३ ॥ कतंरी दोष लग्नात्पापावज्वनजू व्ययार्थस्थो यदा तदा। कतंरी नाम सा ज्ञेया मृत्युदारिद्रशशोकदा ॥ ४४ ॥ नाम अन्वयः--यदा ऋज्वनजू पापौ लग्नात व्ययार्थस्थी (स्याताम्) तदा कतेरी ज्ञेया । सा मृत्युदारिद्रभशोकदा (भवति) ॥ ४४ ॥ पापयदि पापग्रह मार्गीं होकर लग्त से बारहवें स्थान में और दूसरा कहते ग्रह वक्री; होकर लग्न से दूसरे स्थान में स्थित हो तो इसे कतेरी दोष देनेहैं। विवाहादि शुभ कार्यों में कर्तरी दोष मृत्यु, दारिद्रथ और शोक ं स्थान वाला होता है । ऐसे ही कोई पापग्रह मार्गी होकर चन्द्रमा से बारहवे हो तो में और दूसरा पापग्रह वक्री होकर चन्द्रमा से दूसरे स्थान में स्थित इसे भी कतैरी कहंते हैं । यह भी पूर्वोक्त फल देनेवाली होती है । इसी रीति से सब भावों की कतंरी होती हैं ॥ ४४ ।। । ेकेल। लोल्नकाला [पीछेको'लौटने ला। | [पीछे बला चलनेवा फ्लोकोक्इल कहेंगेली । [आंगें ्षाज् #आगगे “एणएणएयगूप विवाहप्रकरण १२३ संग्रह «दोष चन्द्रे सुर्यादिसंयुक्ते दारिद्रयं मरणं शुभम् । सोख्यं सापत्न्यवराग्ये पापद्ययुते मृतिः ॥ ४५॥ अन्वयः--चन्द्रे सूर्यादिसंयुक्ते दारिद्रयं, मरण, शुभं, सौख्यं (स्यात) सापत्न््यवराग्ये (भवतः) तथा पापद्ययूते (चन्द्रे) मृति: स्थात् ॥ ४५ ॥ विवाहकाल में चन्द्रमा यदि सूर्य के साथ होतो स्त्री-पुरुष दरिद्र होते हैं, मंगल के साथ होतो दोनों की मृत्यु, बुध के साथ हो तो शुभ, बृहस्पति के साथ हो तो सुख और शुक्र के साथ हो तो स्त्री केसौत आती है तथा दनश्चर संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष में प्रीति नहीं होती है। यदि चन्द्रमा दो, तीन अथवा कई पापग्रहों से संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष की मृत्यु होती है । नारदजी ने बुध के योग में सनन््तान-हानि, बृहस्पति के योग में भाग्य-हानि, दनेदचर के योग में संन्यास, राहु के योग में स्त्री-पुरुष का परस्पर झगड़ा और केतु के योग में सदा कष्ट वा दरिद्रता कहा है। यदि चन्द्रमा अपनी उच्च राशि में, अपने मित्र की राशि में अथवा अपनी राशि में स्थित होकर शुभग्रह-संयुक्त होतो शुभफेलकारक और यदि इससे विपरीत हो तो अशुभफलकारक होता है ॥ ४५ ॥ अष्टमलग्न का दोष और परिहार जन्मलग्नभयोमृ त्युराशौः नेष्ट: करग्रह: । एकाधिपत्ये राशीशमंत्रे वा नेव दोषकृत् ॥ ४६॥ अन्वयः--जन्मलग्नभयो: मृत्य्राशौं करग्रहः नेष्ट: । एकाधिपत्ये वा राशीशमैत्रे नैव दोषकृत् ।। ४६ ।॥। स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न में विवाह शभ नहीं होता । यदि जन्मलग्न का स्वामी वा जन्मराशि का स्वामी जन्म- लग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न का भी स्वामी हो अथवा आठवीं लग्न के स्वामी का मित्र हो तो उक्त दोष नहीं होता ॥। ४६ ॥। अन्य परिहार मीनोक्षकर्कालिमृगस्त्रियोषष्टमं लग्नं यदा नाष्टमगेहदोषकृत् । अन्योन्यमित्रत्ववशेन सा वधूभंवेत्सुतायुग हसौर्यभागिनी ॥ ४७ ॥॥ »« चन्द्रमा केसाथ एक राशि में अन्य ग्रहों के रहेने का नाम । मुहत्तचिन्तामणि श्स्ढ अन्वय:--मीनोक्षकर्कालिमृगस्त्रियः यदा अष्टमं लग्नं (भवेत्) तदा अष्टमगेहदोषकृत् न (स्थात्) अन्योन्यमित्रत्ववशेन सा वधू: सुतायुग हसौख्यभागिनी भवत् ।। ४७ ।। यदि स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न मीन, बृष, कर्क, वृश्चिक, मकर और कन्या में से कोई हो तो आठवीं लग्न का दोष नहीं होता; क्योंकि ये दोनों परस्पर मित्र अथवा एक ही हैं। उदा- हरण--यथा स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न या जन्मराशि सिंह हो तो उससे आठवीं मीन हुई । सिंह के स्वामी सूर्य. और मीन के स्वामी बृहस्पति की परस्पर मित्रता होने के कारण विवाह में दोष नहीं हो सकता । ऐसे ही तुला से आठवीं वृष होती है । तुला और वृष दोनों का स्वामी शुक्र है, इसलिये विवाह में कोई दोष नहीं हो सकता, ऐसे ही कर्कादि को भी जानना चाहिए। यदि ऐसे योग में विवाह हो तो वह स्त्री उत्तम पुत्र, आयु, उत्तम घर और सुख पाती है ॥। ४७ ॥ . आठवीं राशि के नवांश और बारहवीं राशि का दोष मृतिभवनांशो यदि च विलग्ने तदधिपतिर्वा न शुभकरः स्थात् । व्यय भवनं वा भवति तदंशस्तद्धिपतिर्वा कलहकरः स्यथात् ॥ ४८४ मनन #+क फ-+--अआकोकनन--की कलर बनता “तक» टन लजज -ा्-अनओो अन्वयः--मृतिभवनांश: वा तदधिपति: यदि विलग्ने (भवेत्) तदा शुभकरः: न स्यात् । यदि व्ययभवनं वा तदंशः- वा तदधिपति: यदि (विलग्ने) भवति तदा कलहकर': स्यात् ।। ४८ ।। स्त्री वा पुरुष की जन्मराशि से वा जल्मलग्न से आठवीं राशि -का नवांश वा आठवीं राशि का स्वामी लग्न में स्थित हो तो विवाह शुभकारक नहीं होता । ऐसे ही बारहवीं राशि, बारहवीं राशि का नवांश वा बारहवीं राशि का स्वामी यदि लग्न में हो तो स्त्री-पुरुष में परस्पर झगड़ा होता है ॥॥ ४८ ।। 4 --५3-33» 4 ननमकु०---.“03-+ ७>९७ 3०.....००.९००.-+-...२७+ विषघटी-दोष खरामतो ३० न्त्यादितिवह्निपित््यभे खबेदतः ४० के रदत ३२ इच सापंभे । खबाणतो ५० 5वे धरवितो १८ यंमाम्बुपे कृते २० भंगत्वाष्ट्रभविश्वजीवर्भ ॥४९ ॥ वियवाहप्रकरण १२५ मनो १४ हिवेवानिलसौम्यशाक्रभे कुपक्षतः २१ शवकरे5ष्टि १६ तोषजभे । युगाश्वितो २४ बुध्न्य भतोययाम्यभे खचन्द्रतो १० मिन्रभवासवश्चुतो ॥ ५०॥। मुले5ड्रबाणा ५६ द्विषताडिका: कृता: वर्ज्या शुभेष्थयो विषनाडिका श्र॒ुवाः। निध्ना भभोगेन खतक ६० भाजिता: सस््फुटा भवेयुविषनाडिकास्तथा ॥ ५१॥ अन्वयः--अन्त्यादितिवक्लि पित््यभे खरामत:, के खबेदत:, सार्पभे रदत:, अश्वे खबाणतः, अयमाम्बूपे धृतितः, भगत्वाष्ट्रभविश्वजीवभे कृतेः, द्विद्वेवानिलसौम्यशाक्रभे मनो:, शवकरे कुथक्षत:, अजभे अष्टित:, बुध्न्यभतोययाम्यभे युगाश्वितः, मित्रभवासवश्रतौ खचन्द्रतः, मूले अद्भवाणात् कृता: [ चतस्र:] विषताडिका: शुभे वर्ज्याट, अथो विषनाडिका श्रुवाः भभोगेन निष्ताः, खतकंभाजिताः तथा स्फुटा विषताडिका भवेयूः ॥ ४६-५१ ॥। रेवती, पुनवंसु; क्ृत्तिका और मघा में तीस दण्ड के बाद चार दण्ड विषघटी होता है । रोहिणी में चालीस दण्ड-के बाद, आइलेषा में बत्तीस दण्ड के बाद, अशिविनी में पचास दण्ड के बाद, उत्तराफाल्गुनी और शतभिष में अठारह दण्ड के बाद; :ूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, उत्तराषाढ़ और पुष्य में बीस दण्ड के बाद चार दण्ड विषनाड़ी .कही जाती हैं । विशाखा, स्वाती, मृगशिरा और ज्येष्ठा में चौदह दण्ड के बाद, आर्द्रा और हस्त में इक्कीस दण्ड के बाद, पूर्वभाद्रपद में सोलह दण्ड के बाद; उत्तराभाद्रपद, पूर्वाषाढ़ और भरणी में चौबीस दण्ड के बाद; अनुराधा धनिष्ठा और श्रवण में दश दण्ड के बाद चार दण्ड विषनाड़ी कही जाती हैं। मूल नक्षत्र में छंप्पन दण्ड के बाद चार दण्ड विषनाड़ी हैं। ये विषनाड़ियाँ शुभ कार्य में त्याज्य हैं । इनमें विवाहादि शुभ कार्य न करना चाहिए। परन्तु यहाँ विशेष यह है कि यदि उक्त नक्षत्रों का पूरे साठ दण्ड का मान हो तब तो उक्त दण्डों के बाद चार दण्ड विषेघटी होती हैं और यदि उक्त नक्षत्रों कामान साठ दण्ड से कम या ज्यादा हो तो उस नक्षत्र के मान को कहे हुए उसके अच्छू से गुणकर जितनी संख्या हो उसमें साठ का भाग देने से जो संख्या लब्ध हो उतने ही दण्ड के बाद चार दण्ड विंषघटी होती हैं ।उदाहरण--यथा रोहिणी नक्षत्र का सम्पूर्ण मान छप्पन दण्ड अठारह पल है । इनको उक्त रोहिणी के चालीस ज्रुवक से गुणा तो दो हजार दो सौ बावन हुएं। इनमें साठ का भाग दिया १२६ मुहत्तचिन्तामणि के बाद ीस पल क बत्तल तो सेंतीस दण्ड बत्तीस पल लब्ध हुए । इन्हीं सेंतीस ह | चार' दण्ड विषनाड़ी होगीं। ऐसे हीऔर भी जानना चाहिए ॥| ४९-५१॥ दिन के पन््द्रह मुहृत्त गिरिशभुजगसित्रा: पितन्यवस्वस्बुविदवे- अल हार इभिजिदय च विधातापोन्द्र इन्द्रानलो च निऋतिरुदकनाथो5प्ययंभमाथोी भगः स्थयु ऋरमदा इह॒मुहूर्ता वासरे बाणचन्द्रा:॥ ५२॥ अन्वयः--गिरिशभूजगमित्रा: पिल्यवस्वम्बुविश्वे अभिजित् अथ तज्र विधाता अधि इमें बाणचन्द्राः च इन्द्र: इन्द्रानलौं, निऋतिः उदकनाथ:, अपि (तथा ) अयेमा अथो भगः (पञ्चदश ) मुहूर्त्ता: क्रमशः वासरे स्यु: ॥ ५२ ॥। दिन का जितना मान हो उसमें पन्द्रह का भाग देने से जो दण्ड पल लब्ध हों वही एक मुहूर्त्त का मान होता है। पहिले मुहत्ते का स्वामी महादेव, दूसरे का सपं, तीसरे का मित्र नामक सूयें, चौथे के पितर, पाँचवें के वसु, छठे का जल, सातवें के विश्वेदेव, आठवें का अभिजित्, नवें का विधाता, का दशवें का इन्द्र, गेरहवें के इन्द्र और अग्नि, बारहवें का राक्षस, तेरहवें वरुण, चौदहवें का अर्यमा नामक सूर्य और पन््द्रहवें काभग नामक सूर्य स्वामी है । क्रम से ये पन्द्रह मुहूत्ते दिन में होते हैं ।। ५२ ॥। रात्रि के सुहत्त शिवो5जपादादष्टो स्युर्भेशा अदितिजीबकों । विष्ण्वकंत्वाष्ट्सरुतो सुहूर्त्ता निशि कीतिताः ॥ ५३ ७ ट्रमरुत: अन्वयः--शिव: अंजपादात् अष्टो. भेशा: अदितिजीवकौ विष्ण्वकेत्वाष् (एते) निशि [रात्रो] मुहूर्त्ता: स्यु: ॥ ५३ ॥। दिनमान को साठ में घटाने पर जो बाकी रहे वह रात्रिमान होता है । का उसमें पन््द्रह का भांग देने सेजो दण्ड-लब्ध हों वह रात्रि में एक मुह॒त्ते मुदहत्त से मात होता है। रात्रि में पहिले मुहूत्त के स्वामी शिव और दूसरे मी लेकर नवें मुहृत्त पर्यनत आठ मुहूत्तों के पूर्वभाद्रपद आदि आठ नक्षत्र स्वा े मुहूर्त्त के होते हैं, अर्थात् दूसरे मुहत्ते केस्वामी अज़पाद नामक शिव, तीसर मुह॒त्तें के अहिर्बुध्त्य नामक शिव, चौथे मुहूत्तें केपूषा नामक सूर्य, पाँचवें यम, सातवें मुहूत्तें के अग्नि, आठवें मुहत्तें के अद्विनीकुमार, छठे मूहत्ते के कुक पप् विवाहप्रकरण १२७ ब्रह्मा, नवें मुहूत्त के चन्द्रमा, दशवें मुहृत्त के अंदिति, गेरहवें मुह॒त्तं के बृहस्पति, बारहवें मुहृत्त के विष्णु, तेरहवें मुहत्त के सूयं, चौदहवें मुह॒त्तं के त्वष्टा अर्थात् विश्वकर्मा और पन्द्रहवें मुहूर्त्त का वायु स्वामी है। क्रम से ये पन्द्रह मुह्त्त रात्रि में होते हैं ॥॥ ५३ ॥ आदित्यादि वारों सें निषिद्ध महत्त रवावयंमा ब्रह्मरक्षश्च सोमे कुजे वह्लिपिश्ये बुधे चाभिजित्स्यात् । गुरो तोयरक्षों भगो ब्राह्मपित्ये शनाबोशसापों सुहरर्त्ता निषिद्धा: ॥ ५४॥ अन्वयः--रवौ अयंमा, सोमे ब्रह्मरक्ष:, कुजे वह्लिपित्ये, बुधे अभिजित्, गुरौ तोय- रक्षौ, भूगो ब्राह्मपित्ये, शनौँ ईशसार्पा, (इमे) मुहूर्त्ता: निषिद्धाः (ज्ञेया:) ॥५४ ॥। रविवार में अरयमा नामक मुह॒त्तं, सोमवार में ब्रह्म और राक्षस दो मुहत्तें, मज्जल में अग्नि और पितर दो मुहृत्त, बुधवार में अभिजित् नामंक मुहत्तें, बृहस्पतिवार में जल और राक्षस दों मुहूर्त, शुक्रवार में ब्राह्म और पितर दो मुहूत्तं, शनेश्चर में महादेव और सर्प दो मुहूर्त निषिद्ध होते हैं । इन दिनों के इन मुहूत्तों में कोई शुभ कार्य न करना चाहिए । इन मुह॒त्तों का और भी यह प्रयोजन है कि किसी कार्य कीआवश्यकता हो और जिस नक्षत्र में उस कार्य के करने को कहा है, वह नक्षत्र उस काल में नहीं हैतो उस नक्षत्र के स्वामी के मुह॒त्त में उसकार्य को कर ले ॥| ५४॥। विवाह के नक्षत्र और अभिजित नक्षत्र कामान निर्वेध:... _ शशिकरमृलमैत्रपित्य- ब्राह्मान्त्योत्तरवनः . शुभो विवाहः। रिक्तामारहिततिथौ शुभेषह्लि वेहवप्रान्त्याड्न्रः श्रुतितिथिभागतो 5भिजित्स्यात् ॥ ५५॥ अन्वयः--निर्वेघिं: शशिकरमूलमैत्रपित्यब्राह्मान्त्योत्त रपवनै:, रिक्तामा रहिततिथौ, शुभे अक्ति, विवाह: शुभ: (स्यात्), तथा वैश्वप्रान्त्यांन्नि: श्रुतितिथिभागतः अभिजित् स्यातं ॥। ५५॥। सूर्यादि ग्रहों सेविद्ध* नक्षत्रों कोछोड़ मृगशिरा, हस्त, मूल, अनुराधा, मघा, रोहिणी, रेवती, तीनों उत्तरा और स्वाती नक्षत्र में चोथ, नवमी, -3_> चतुर्दशबअमन ी, अमावासअ्या आयकोपल छोड़ लय अन्य :तिथियो सिथियंोंमें और और:सुभ शुभ दिन दिन अकात, प्रताप त्ञ ू7_ ___ -- में. *वेध का प्रकार आगे कहेंगे । श्श्द मुहत्तचिन्तामणि सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्रवार में विवाह शुभ होता है। उत्तराषाढ़ नक्षत्र के चौथे चरण से लेकर श्रवण के चार दण्ड बीते तक अभिजित् नाम नक्षत्र कहा जाता है ॥ ५५॥। ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध वेधोउन््योन्यमसी विरिड्च्यभिजितोर्याम्यानुराधकक्षेयो- बिश्वेन्द्रोहे रिपिव्ययोग्रहकृतो.. हस्तोत्तराभाद्रयो: । स्वातीवारुणयोभंवेन्नि ऋतिभादित्योस्तथोपान्त्ययोः खेटे तत्र गते तुरीयचरणाद्योर्वा तृतीयद्यों: ॥ ५६॥ अन्वयः--विरिज्च्यभिजितो:, . याम्यानुराधक्ष॑यो:, .विश्वेन्द्रो, हरिपित्ययो:, ग्रहक्नतः वेध: हस्तोत्तराभाद्रयो:, स्वातीवारुणयो:, निऋतिभादित्यो:, तथा उपान्त्ययो: भवेत् । तत्न गते खेटे तुरीयचरणाद्यो: वा (तथा) तृतीयद्यो: वेधः भवेत् ॥ ५६ |। पाँच रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं के ऊपर पाँच आडी रेखा और चारों कोनों में दो-दो तिरछी रेखा खींचे, तबजो आकार बन जाता है, उसे पड्च- शलाका चक्र कहते हैं। इस चक्र में ऊपर बाई ओर के कोने में खींची हुई दूसरी रेखा के छोर पर क्त्तिका नक्षत्र स्थापित करके फिर दाहिने क्रम से त सब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी से लेकर भरणी पर्यन्त सब नक्षत्र स्थापि उन किये जाते हैं। तब एक रेखा के दोनों छोरों पर जो नक्षत्र रहते हैं ् दोनों का परस्पर वेध होता है। उदाहरण--यथा रोहिणी और अभिजित श्रवण का, भरणी और अनुराधा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, शतभिष का, और मघा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, स्वाती और है । मूल और पुनव॑ंसु का, उत्तराफाल्गुनी और रेबती का परस्पर वेध होता दो नक्षत्रों में परन्तु यह वेध ग्रहकृत होता है, अर्थात् एक रेखा में स्थित यथा रोहिणी से किसी एक में जो ग्रह स्थित हो वह दूसरे को वेधता है। में कोई ग्रह स्थित हो तो वह अभिजित् को वेधता है और अभिजित् में कोई ग्रह स्थित हो तो वह रोहिणी को वेधता है। ऐसा ही वेध सब नक्षत्रों में जानना चाहिये । इसी चक्र में पाद-बेध भी कहते हैं । उसकी रीति यह उनमें है कि एक रेखा में स्थित जिन दो नक्षत्रों कापरस्पर वेध होता है स्थित से कसी नक्षत्र केचौथे पाद में ग्रह स्थित होतो वह उसी रेखा में दूसरे नक्षत्र केपहिले पाद को वेधता है, यदि तीसरे पाद में स्थित हो तो दूसरे पाद को और दूसरे पाद में स्थित हो तो तीसरे पाद्र को और पहिले ै विवाहप्रकरण १२९ पाद में स्थित हो तो चौथे पाद को वेक्षता है। यथा रोहिणी के पहिले पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के चौथे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के चौथे पांद में स्थित ग्रह अभिजित के पहिले पाद को वेधता है। इसी तरह अन्यत्र भी पादवेध जानना चाहिए ॥ ५६ ॥। सप्तशलाका चत्र में ग्रहों हारा नक्षत्रों का वेध शाक्रेज्ये शझतभानिले जलशिवे पौष्णायंमक्षें वसुदीश वंह्वसुधांशभे हयभगे सार्पानुराधे मिथः। हस्तोपान्तिमभे विधातृविधिभ मूलादितो त्वाष्ट्रभाजाडइघ्री याम्यमघ कृशानुहरिभे विद्धे कुभद्रेखिके ॥ ५७॥ अन्बयः -कुभुद्रखिके (सप्तशलाके चक्र) शाक्रेज्ये, शंतभानिले, जलशिवें पौष्णाय॑मक्षें, वसुद्दीश, वेश्वसुधांशुभे, हयभग, सार्पानुराध, हस्तोपान्तिमभे, विधातृविधिभे, मूलादिती, त्वाष्ट्रभाजांच्री, याम्यमघे, कृशान्हरिभे, मिथ: विद्धे (स्त:) ।। ५७ ॥ सात रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं केऊपर सात रेखा आड़ौ खींचने से जो आकार बन जाता है उसे संप्तशलांका चक्र कहते हैं। इस सप्तशलाका चक्र में ऊपर बाई ओर खड़ी रेखा के छोर पर क्रत्तिका नक्षत्र को स्थापित करके दाहिने क्रम सेसब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी आदि भरणीपयंत सब नक्षत्र स्थापित किये जाते हैं। तब जो एक रेखा के दोनों छोरों पर दो नक्षत्र रहते हैं उर्नक़ा परस्पर वेध होता है। यथा ज्येष्ठा और पुष्य का, शतभिष और स्वाती का, पूर्वाषाढ़ और आर्द्रा का, रेवतीं और उत्तरा- फाल्गुनी का, धनिष्ठा और विशाखा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, अश्विनी और पूर्वाफाल्गुनी का, आश्लेषा और अनुराधा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, रोहिणी और अभिजित् का, मूल और पुनवंसु का, चित्रा और पूर्वाभाद्रपद का, भरणी और मधघा का क्रृत्तिका और श्रवण का परस्पर वेध होता है। यह वेध भी ग्रह के द्वारा होता है अर्थात् एक रेखा के दोनों छोरों पर स्थित दो नक्षत्रों मेंसेकिसी एक नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वहं ग्रह उसी रेखा के दूसरे छोर पर स्थित दूसरे नक्षत्र को वेधता है । यथा ज्येष्ठा नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह पुष्य नक्षत्र को वेधता है, अथवा पुष्य ही नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह ज्येष्ठा नक्षत्र को वेधता १३० मुहत्तचिन्तामणि है । इसी तरह इस सप्तशलाका चक्र में क््रग्रह* करके वेधा हुआ नक्षत्र और शुभग्रह करके वेधा हुआ नक्षत्र का एक पाद विवाहादि शुभ कार्यों में त्यागना चाहिए; क्योंकि दीपिका ग्रन्थ में कहा है कि जिस स्त्री के विवाहकाल में सप्तशलाका चत्र में पापग्रहों वा शुभग्रहों सेचन्द्रमा विद्ध हो वह स्त्री विवाहकाल ही के वस्त्र पहने रोती हुई श्मशानभूमि को क् जाती है ॥ ५७ ॥। सप्तशलाका चक्र कृ, रो. मृ.आा. पु. पु. श्ते. भें, अ. उ. पृ. मू,ज्यै. भर. ऋरग्रहों सेविद्ध नक्षत्रों कादोष और उसका परिहार ऋशक्षाणि ऋरविद्धानि ऋ्रमुक्तादिकानि च । भकत्वा चन्द्रेण मुक्तानि शुभाहाणि प्रचक्षते ॥ ५८॥। अन्वयः--क्ररविद्धानि क्रभक्तादिकानि च ऋक्षाणि (तानि यदि) चन्द्रण भुकत्वा मक््तानि (तदा) शुभाह॑णि प्रचक्षते ॥ ५८ || जो नक्षत्र क्ररग्रहों करके पंचशलाका या सप्तशलाका चत्र में वेधे गये हों और जिनकों क्ररग्रहों नेभोग करके शीघ्र ही छोड़ दिया होऔर जिन नक्षत्रों में क्रग्रह स्थित हों और जिन नक्षत्रों में क्ररग्रह जानेवाले हों और जिन नक्षत्रों मेंभौम, देव, आन्तरिक्ष, इन तीन प्रकार के उत्पातों में से कोई उत्पात हुआ हो, वे सब नक्षत्र शुभ नहीं होते ।इसलिए उन नक्षत्रों में विवाहादि शुभ कार्य नहीं करना चाहिए और उन्हीं नक्षत्रों कोयदि चन्द्रमा ने भोग करके छोड़ दिया हो तो शुभ हो जाते हैं अर्थात् एक महीने के बाद वे सब नक्षत्र शुभ कार्य करने के लिए शुभ हो जाते हैं ॥ ५८॥। । जातेहैंहैं।.. कहेजाते पापप्रह कहे तथापापभ्रह क्रतथा येक्रर कैतु ये ओरकैतु राहुऔर शनैश्चर, राहु मजजल,शनैश्चर, चन्द्रमा,मल, क्षीणचन्द्रमा, $स्,क्षीण “7 *सूर्य, ननक"पे सेक्शन #०्साकताक्रज ह>ेक विधाहप्रकरण १३१ लत्तादोष ज्ञराहुपूर्णन्दुसिताः स्वपृष्ठे भ॑ सप्तगोजातिशरंभितं हि। संलत्तयन्तेषक शनीज्यभौमाः सूर्याष्टतर्काग्निसितं पुरस्तात् ॥ ५९ ॥॥ अन्वयः--ज्ञ राहुपूर्णेन्दुसिता: स्वपृष्ठे सप्तगोजातिशरेमितं भं संलत्तयन्ते । (तथा) अकंशनीज्यभौमा: पुरस्तात् (अग्ने) सूर्याष्टतर्काग्निमितं भं संलत्तयन्ते ॥ ५७ ॥ बुध, राहु, पूर्ण चन्द्रमा, शुक्र ये ग्रह क्रम सेअपने पिछले सातवें, नवें, बाइसवें, पाँचवें नक्षत्र को लतिआते हैं अर्थात् बुध जिस नक्षत्र में स्थित हो उससे पिछले सातवें नक्षत्र को, राहु नवें नक्षत्र को, पूर्ण चन्द्रमा बाइसवें नक्षत्र कोऔर शुक्र पाँचवें नक्षत्र कोलात से मारता है। परन्तु राहु सदा वक्ती रहता है। इसलिए यदि वह अश्विनी सक्षत्र में स्थित हो तो उसका पिछला नवाँ नक्षत्र ब्लेषा होता है। सूर्य, शनेरचर, बृहस्पति, मज्जल, ये ग्रह क्रम सेअपने अगले बारहवें, आठवें, छठे, तीसरे नक्षत्र को लतिआते हैं, अर्थात् सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित होता है उससे अगले बारहवें नक्षत्र को, शनैश्चर आठवें नक्षत्र को, बृहस्पति छठे नक्षत्र कोऔर मड्भल तीसरे नक्षत्र विवाह नहीं करना को लात से मारता है | प्रयोजन यह हैंकि इन नक्षत्रों में चाहिए; क्योंकि सूर्य की लत्ता धन का नाश और चन्द्रमा, मर्जुल, बुध, राहु इन ग्रहों की लत्ता वर-कन्या का नाश और बृहस्पति की लत्ता बंधु का नाश और शुक्र की लत्ता कार्य का नाश करती है, ऐसा वराहजी ने कहा है ॥ ५९॥। पातयोग हंणवंधृतिसाध्यव्यतिपातकगण्डश््लयोगानाम् । अन्ते यज्नक्षत्र पातेन निपातितं तत्स्यात् ॥ ६० ।॥ अन्वयः--हरष णवैधुतिसाध्यव्यतिपातकगण्डशूलयोगानाम् अन््ते येत् नक्षत्र तत् पातेन निपातितं स्यात् !। ६।। हषंण, बैधुृति, साध्य, व्यतीपात, गंड, शूल इन योगों के समान काल में जो नक्षत्र होवह पातदोष से दूषित किया जाता है। उदाहरण--यथा किसी दिन कृत्तिका नक्षत्र २२ दण्ड ५ पल है और हर्षण योग १९ दण्ड ९ पल है। अब यहाँ हर्षणयोग कृत्तिका नक्षत्र ही में समाप्त है, इस कारण कृत्तिका नक्षत्र पात से दूषित है। ऐसे नक्षत्र विवाहांदि शुभ कार्यों में त्याज्य होते हैं। इसी पात-दोष को नारद और वश्िष्ठजीं ने अन्य प्रकार से कहा है मुह॒त्तचिन्तामणि १३२ र हलेषा, मघा, रेवती, कि सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हो उस नक्षत्र सेलेक नी संख्या हो अश्विनी चित्रा, अनुराधा, श्रवण इन नक्षत्रों तक गिनने से जित से दूषित होता है । को लेकर उतनी ही संख्यावाला दिन नक्षत्र पातदोष ण नक्षत्र तक गिनने से उदाहरण--यथा ज्येष्ठा में सूर्य है उससे लेकर श्रव ्र हुआ । यही पातपाँच संख्या हुई ।अब अदिवनी से पाँचवाँ मृगशिरा नक्षत ।। ६० ।। दूषित हुआ । ऐसे ही और भी जानना चाहिए ऋन््तिसाम्य योग े। पत्चास्थाजौ गोमृगौ तौलिकुम्भाँ कन्यामीनौ कक््येली चापयुग्म तत्रान्यो5न्यं चन्द्रभान्वोनिरुक्त क्रान्तेः साम्यें नो शुभ मद्भलेष ॥ ६१॥ येली, चापयूग्मे तत्र अन्वयः--पञ्चास्थाजौ, गोमृगौ, तौलिकुम्भौ, कन्यामीनौ, ककक्् (तत्) मंगलेषु नो शुभं अन्यो5न्यं (स्थितयो:) चन्द्रभान्वों: क्रान््तेः साम्यं॑ निरुक््त स्यात् ॥ ६१ |। में सूर्य सिह और मेष इन दोनों में सेकिसी एक में चन्द्रमा और दूसरे -मकर, तुला-कुम्भ, स्थित हो तो क्रान्तिसाम्य योग होता है। ऐसे ही वृुष में से किसी कन्या-मीन, कर्क-वुह्चिंक और धनुं-मिथुन, इन दो-दो राशियों म्य होता है । एक में सूर्य और दूसरी राशि में चन्द्रमा स्थित हो तो क्रान्तिसा यह विवाहादि शुभ कार्यों में शुभ नहीं होता ॥ ६१॥। एकागंल दोष परिघातिगण्ड । व्याघातगण्डव्यतिपातपू्वंशलान्त्यवप्त्े.. योगे विरुद्धे त्वभिजित्समेलः खार्जुरमर्काद्विषमे शशी चेत् ॥ ६२ ॥ च्त८७.4 पे केक *-जन कं 8433-30. ०-९७ +२... की.##.. +3+ ) विरुद्ध अन्वयः--व्याघातगण्डव्यतिपातपूर्वशलान्त्येवंओ परिधातिगण्डे (अस्मिन् (तदा) खार्जूरं योगे चेत् (यदि) अभिजित्समेतः शश्ञी « अर्कात् विषमे (स्थितः) स्यात् ॥| ६२ ॥। जिस दिन व्याघात, गंड, व्यतीपात, -विष्कुम्भ,- शूल, वंधृति, वज्ञ, कोई योग हो और जिस नक्षत्र में सूर्य परिघ, अतिगंड इन योगों में से दिन स्थित हो उस नक्षत्र सेलेकर विषम नक्षत्र में चन्द्रमा स्थित हो उस का भी खार्जूर दोष होता है । यहाँ सम-विषम की गणना में अभिजितू है। उदाहरण-ग्रहण है । यह योग विवाहादि शुभ कार्यों में निन्दित होता सूय यथा द्वादशी, रविवार और मूल नक्षत्र व्याघात: योग है,. और विवाहप्रकरण उत्तराषाढ़ में है,इसलिए उत्तराषाढ़ १३३ सेआभिजित्सहित मूल नक्षत्र तक सत्ताइस हुए । यहाँ सूर्य से चन्द्रमा विषम नक्षत्र में हैं, इसलिए एकार्गेल दोष है। इस दिंन विवाह करना अच्छा महीं है। इस दोष को एकार्गल भी कहते हैं | ६२ ।। उपग्रह दोष दराष्टदिक्शक्रनगातिधृत्यस्तिथिध तिशच॒प्रकृतेश्च पतन्च । उपग्रहाः सूयभतोडब्जताराः शुभा न देदों कुरुबाह्लिकानाम् ॥ ६३ ॥ अन्वयः--सूर्यंभतः अब्जतारा: (यदि) शराष्टदिकशक्रनगातिधृत्य: तिथि:, धृतिः प्रकृत: पञच (स्यः) (तदा) उपग्रहाः भवन्ति ते कुरुबाह्लिकानां देशे शुभाःन भवन्ति ॥| ६३ ॥। जिस नक्षत्र में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से (| ५। १० | १४। ७ । १९ ।१५। १८। २१।२२। २३। २४ । २४ ये चन्द्रमा के तेरह नक्षत्र उपग्रह दोष से दूषित होते हैं। कुरु तथा बाह्लीक देशों में शुभ कार्य करने के लिये ये अशुभ गिने जाते हैं ।। ६३ ।। पातादि दोषों पर विशेष पातोपग्रहलत्तासु॒ नेष्टोडिसप्रः खेटपत्सस: । वारस्त्रिघ्नो5ष्टभिस्तष्ट: सेकः स्यादद्धयासकः ॥। ६४॥॥। अन्वयः--पातोपग्रहलत्तासु खेटपत्समः अंधिि: नेष्ट: स्यात्। (अथ ) वार: त्विध्नः अष्टनि: तष्ट: संक: अद्धंयामकः स्यात् ॥| ६४ ।। पात, उपग्रह और जत्ता दोष में दोषकारक ग्रह जिस नक्षत्र केजिस चरण में स्थित हो उस नक्षत्र कावही चरण अशुभ होता है अर्थात् पात और उपग्रह में तो जिस नक्षत्र केजिस चरण में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से पाँचवें आदि चन्द्रमा के नक्षत्र कावही चरण दृषित होता है। और लत्ता दोष में लत्ताकारक ग्रह, नक्षत्र चन्द्रमा के नक्षत्र केजिस चरण में स्थित होते हैं का वही चरण दोषी होता है, सम्पूर्ण नक्षत्र दोषी नहीं होता । अब अद्धयाम दोष कहते हैं। दिनमान में आठ का भाग देने से जो दण्डपल लब्ध हों, उनको अद्धंयाम कहते हैं। ऐसे आठ अद्धंयाम एक दिन में होते हैं। उनमें एक अशुभ होता है। उसके जानने की यह रीति है कि जिस दिन उस अल्युभ अद्धंयाम को जानना हो, रविवार से उस दिन तक मुहत्तचिन्तामणि १३४ देने से गिनने से जितनी संख्या हो उसे तीन से गुणा करके आठ का भाग संख्याजो बाकी बचे उसमें एक और मिलाने से जितनी संख्या हो उतनी वाला अद्धंयाम अशुभ होता है। उदाहरण-झनयथा रविवार से मंगलवार का तक की तीन संख्या को तीन से गुणा किया तो नव हुए । उसमें आठ । भाग दिया तो एक शेष रहा । उसमें एक और मिलाने पर दो हुए इससे ज्ञात हुआ कि मंगलवार का दूसरा अद्धयाम अशुभ होता है । ऐसे ही अन्य दिनों में भीजानना चाहिए, सो चत्र में मैंने स्पष्ट कर दिया है ।। ६४ |। अशुभ अद्धयाम चक्र न दिन शुक्रवार |शनेश्चर ि |य ् |बृहस्पत न र | बुधवार | मंगलवाध ्ग सोमवार व्पम 'उनममननन>>मममममक अमनम»ममम»्मममममाक |आममम॥भम २+... ४ मर». आन्न्मनन्> है...0 एण पििगायय ७ २ आयाााभममकननक. ५न+न+नान+++-म मम) |. ५ ह_पानमाना--मममक आकानभममामामम है.73.2... सन नगनमममममाम ८ ३ अर दल ६ | अशुभ अर्द्धयाम कुलिक दोष शक्राकंदिग्वसुरसाब्ध्यक्विन कुलिका रवेः। रात्रौ निरेकास्तिथ्यंशा: शनी चान्तेषपि निन्दितः ॥ ६५॥। अन्वयः--रवे: [सकाशात् क्रमेण ]शक्राकंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विन: तिथ्यंशाः |मुहूर्त्ता: | ें:) कुलिका: स्युः (ते) निरेका: राबौ कुलिका: (ज्ञेया:) च शनो अन्त्येष्पि (मुहत्त निन्दितः स्यात् ॥। ६५ | क् । | | ।द | | द क् सूर्यादि वारों में१४। १२९। १० । ५। ६। ४। २ ये मुहूत्ते कुलिक संज्ञक होते हैं, अर्थात् दिनमान में पन्द्रह का भाग देने सेजो दण्डपल लब्ध हों उनको मुह॒त्ते कहते हैं । ऐसे पन्द्रह मुहत्त एक दिन में होते हैं। उनमें रविवार को चौदहवाँ, सोमवार को बारहवाँ, मंगल को दशवाँ, बुध को आठवाँ, बृहस्पति को छठा, शुक्र को चौथा, शने₹चर॑ को दूसरा मुहत्ते कुलिक- संज्ञ़क होता है। यही सब मुह॒त्त एक हीन होकर इन्हीं दिनों की रात्रि में कुलिक होते हैं अर्थात् रविवार की रात्रि में तेरहवाँ, सोमवार की रात्रि में गेरहवाँ, मंगलवार की रात्रि में नवाँ, बुध की रात्रि में सातवाँ, बृहस्पति की | | रात्रि में पाँचवाँ, शुक्र की रात्रि में तीसरा, शनैइचर की रात्रि में पहिला तथा पन््द्रहवाँ भी मुहृत्त कुलिकसंज्ञक होता है। ये मुहूत्ते विवाहादि शुभ कार्यों में | अशुभ होते हैं । ६५ ।। 5 |क् | द दग्धातिथि_ चापान्त्यगे गोघटगे पतड़ कर्काजगे स्त्रीमिथुने स्थिते च । सिहालिग नक्रधटे समाः स्युस्तिथ्यो द्वितोयाप्रमुखाइच दग्धा: ॥ ६६॥ अन्वयः--चापान्त्यगे, गोघटगे, कर्काजगे, स्त्नीमिथुने स्थिते च सिहालिगे नक्रधटे, पतंगे [सूर्य |सति (क्रमेण) द्वितीयाप्रमुखा: समाः तिथ्यः दरधा: (भवन्ति) ॥ ६६॥। धनु-मीनादि राशियों में सूर्य केस्थित रहते द्वितीयादि सम तिथियाँ दग्धसंज्ञक होती हैं, अर्थात् धनु और मीन राशि में सूर्य केस्थित रहते द्वितीया, वृष और कुम्भ राशि में सूर्य के रहते चतुर्थी, कर्क और मेष राशि में सूर्य केरहते षष्ठी, कन्या और मिथुन राशि में सूर्य के रहते अष्टमी, सिह और वृश्चिक राशि में सूर्य केरहते दशमी तथा मकर और तुला राशि में सूये केरहते द्वादशी तिथि दग्धा होती है। दग्धा तिथि सें विवाहादि शुभ काम न करना चाहिए ॥।| ६६ ॥। दंग्धातिथिचक्र धनु-मीन वृष अप कर्क ह अ ४ मेष मिथुन ्् एप मह क सिह वृश्चिक | १० जामित्र दोष लग्नाच्चन्द्रान्मदन भवनगे खेटे न स्थादिह परिणयनम् । किवा बाणाशुगमितलवगे जामित्र स्थादशु भकरमिदम् ॥ ६७॥ अन्वयः--लग्नात् (वा) चन्द्रात् मदनभवनगे किवा बाणाशुगमितलवगे खेटे (सति) जामित्न स्थात्, इह परिणयन न स्यात्, इद् अशुभकरं स्यात् ।। ६७ ॥। विवाह की लग्न से अथवा चन्द्रमा से सातवें स्थान में यदि कोई ग्रह स्थित हो तो जामित्र दोष होता है। जामित्र दोष में विवाह न करना चाहिए । लग्न और चन्द्रमा जिस नवांश में हो उससे पचपनतवें नवांश में यदि कोई ग्रह स्थित हो तो, और कोई ग्रह जिस नवांश में स्थित हो उससे पचपनवें नवांश में यदि लग्न या चन्द्रमा होतों भी जामित्र दोष होता मुह॒ृत्तंचिन्तामणि १३६ है । यह जामित्र दोष विवाहादि शुभ कार्यों में अति अशुभकारक होता है ।। ६७ ।॥। एकार्ग लादि दोषों का परिहार एकार्गलोपग्रहपातलत्ताजामित्रकतंयुंदयास्तदोषाः । नदयन्ति चन्द्राकं बलोपपन्ने लग्ने यथार्काम्युदये तुदोषा । ६८॥। अन्वयंः-चन्द्राकंबलोपपन्ने लग्ने [सति] एकार्गलोपग्रहपातलत्ताजामित्नकर्तेर्युदयास्त- -न-ननननन-+--3-4++>-मन ७» ०--+-3-जपी कस. : >+%.. की “४+5५०+-+--+७«» «*----७-२०७.-२.७ ८-७७ ७३०७-०० ॑न-अक-कना+मकाक >+ दोषा: नश्यन्ति; यथा अर्काभ्युदये दोषा (रात्रि: नश्यति) ।। ६८ ।। यदि विवाह लग्न सूर्य-चन्द्रंमा के स्वोच्चादि-स्थान-स्थितिरूप बल से युक्त हो तो एका्गल, उपग्रह, पात, लत्ता, जामित्र, कर्तरी, उदयास्तदोष, ये सब नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य केउदय होते ही रात्रि नष्ट हो जाती है ॥ ६८॥ देशभेद से उक्त दोषों का परिहार उपग्रह कुरुबाह्लिकेषु कलिगबंगेषु च॑ पातित॑ भम् । _ सौराष्ट्शाल्वेषु च लत्तितं भ॑ त्यजेत्तु विद्धं किल संदेश ॥ ६९ ७ सौराष्ट्रअन्वयः--कुरुबाह्िकेषु [देशेषु |उपग्रहक्ष, च कलिज्भूबज्भेषु पातितं भं, च शाल्वेष लत्तितं भ॑ त्यजेत्, विद्धं भंतुसवंदेशे किल (निश्चयेन ) त्यजेत् ॥ ६८ ॥। कुरु और बाह्लीक, इन पश्चिम के देशों में उपग्रह दोषयुक्त नक्षत्र का; कलिज् और बज्भ, इन पूर्व के देशों में पात दोष का; सौराष्ट्र और शाल्व, इन परिचम के देशों में लत्तादोषयुक्त नक्षत्र काऔर पञ्चशलाकादि चत्र द्वारा ग्रहों से वेधे हुए नक्षत्र का सब देशों में त्याग करना चाहिए ॥ ६९॥ दश दोष शशाडूसूरययक्षयुतेभंशेष॑ खे॑ भूयुगाड़्रानि दशेशतिथ्यः । नागेन्दवो ड्ेन्द्रुमिता नखाइचे:्धूवन्ति चेते दशायोगसंज्ञा: ॥ ७० ॥ अन्वयः--शशाडूसूयक्षेयुते: भशेष॑ ख॑ं भूयुगांगानि दशेशतिथ्य: नागेन््दव: अंकेन्दुमिता: ॥। ७० ॥ नखाः चेत् (यदि) भवन्ति च (तदा ) एते (क्रमेण )दशयोगसंज्ञा: (भवन्ति) अश्विनी से लेकर सूर्य और चन्द्रमा के नक्षत्र तक अलग-अलग गिने । फिर उन दोलों संख्याओं को जोड़कर उसमें सत्ताइस का भाग देने से यदि दन््य, एक, चार, छः, दस, गेरह, पन्द्रह, अठारह, उन्नीस, बीस ये अद्धू बाकी बचें तो दोषी होते हैं, उस नक्षत्र में विवाह शुभ नहीं होता । उदाहरण--यथा उत्तराषाढ़ में चन्द्रमा और अनुराधा नक्षत्र में सूर्य स्थित है । अश्विनी से जी न््फृ >> *ह <क०ककरीकल्न+-५ ऑन अजीत अककनान कक 2+ ह७एंआणा८ंाआआ४छ्रणछएणछाांध विवाहप्रक रण । १३७ चन्द्रमा के नक्षत्र की इक़कीस संख्या और सूर्य के नक्षत्र की सत्रह संख्या हुई । इन दोनों का जोड़ अड़तीस हुआ । इसमें सत्ताइस का भाग दिया तो बाकी गेरह बचे । उक्त रीति से यह अद्धू दोषी है, इसलिए उत्तराषाढ़ नक्षत्र में विवाह शुभ नहीं है । ये दश अच्भू गिनाये ग्ये हैं; इसलिए इनका नाम पड़ गया है ॥ ७० ॥। दशयोग उक्त दश दोषों का फल वाता भ्राग्निस पच्चो ही रमरणं रुग्वज्ञवादा: क्षति- क् योगाडू: दलिते समे मनुयुतेष्योजे तु संकेडड्िते । भें दाल्रादथ संमितास्तु मनुभीरेखाः क्रमात् संलिखेठेधे$स्मिन् प्रहचन्द्रयोनं शुभद: स्थादेकरेखास्थयो: ॥। ७१॥ अन्वयः--वाता भ्राग्निम पचो रम हीरण रुग्वज्ञवादा: क्षति: (इति क्रमेण दशयोग- फलानि ज्ञेयानि) अथ समे योगाड् दलिते मन्युते ओजे [योगांके |सैके अद्धिते (सत्ति) दास्रात् भ॑ (ज्ञेयम्) अथ मनृभिः सम्मिताः: रेखा: क्रमात् संलिखत् अस्मिन् एंकरेखास्थयो: ग्रहचन्द्रयो: बेध: न शुभद: स्यात् ।। ७१॥। इन पूर्व कहे हुए दश अज्छ्ों में सेयदि शून्य शेष हों. तो विवाहकाल में वायु बहुत चले, एक शेष हो तो बादल बहुत हों, चार शेष हों तो अग्नि लगे, छः शेष हों तो राजदण्ड हो, दश शेष हों तो चोरीं हो, गेरह शेष हों तो मरण हो, पन्द्रह शेष हों तो रोग हो, अठारह शेष हों तो बिजली गिरे, उन्नीस शेष हों तो झगड़ा हो, बीस शेष हों तो हानि हो। इस कारण इन दह योगों को विवाह, देवादिप्रतिष्ठा, यज्ञोपवीत, पंसवनकम, कर्णछेद, मुण्डनादि शुभ कर्मों में त्यागना चाहिए। अब इन दर योगों का परिहार कहते हैं । पूर्व कहे हुए दश अद्धभों में सेयदि सम अड्भूबाला योग आ पड़े तो उसके दो भाग करके एक भाग में चौदह और मिलावे और यदि विषम अड्भूवाला योग आ पड़े तो उसमें एक और मिलाकर सम करे । तदनन्तर उसके दो भाग करके एक भाग में चौदह और मिलावे । तब जितनी संख्या हो अश्विनी से लेकर उतनी संख्यावाले नक्षत्र कोआड़ी चौदह लकीरों से बने हुए चक्र के आदि में लिखकर क्रम से अभिजित् सहित अटठाइस नक्षत्र रेखाओं के छोरों पर लिखे । उन नक्षत्रों में जो ग्रह स्थित हों उन्हें भी वहीं लिखे । यदि इस चक्र में किसी ग्रह और चन्द्रमा का परस्पर वेध हो तो वह अशुभ होता है, अर्थात् इस चक्र की किसी एक ही रेखा के एक छोर पर चन्द्रमा हो और दूसरे छोर मुहृत्तचिन्तामणि है| १३८ | । पर शुभ या अशुभ कोई अन्य ग्रह स्थित हो तो पूर्वोक्त दश योगों में से यह योग अति अशुभकारक होता है और यदि दूसरे छोर पर कोई ग्रह न स्थित | हो तो अशुभकारक नहीं होता । उदाहरण-यथा पूर्वोक्त दश योगांकों में से द | में चौदह और मिलाया तो उन्नीस हुए । अब अध्वनी से गिना तो उन्नीसवाँ मूल नक्षत्र हुआ और उन्हीं पूर्वोक्त दश योगों में सेगेरह संख्यावाला योग तो छः छः: है तो यहाँ एकऔर मिलाया तो बारह हुए । इनके दो भाग किये | | | | हुए । एक स्थान में चौदह और जोड़ा तो बीस हुए । अश्विनी से लेकर गिना तो बीसवाँ पूर्वाषाढ़ नक्षत्र हुआ। इन सन और विषम दोनों अद्धों सेआये हुए मूल और पूर्वाषाढ़ नक्षत्रों में सेमूल नक्षत्र को आदि में लिखकर चक्र को स्पष्ट करता हूँ। %“/53 कक सू० कक 3 2 है 20 आ6,..,.६. 5 २७ के व पक कस 5 णशु०चं ०-चि ० | कक... | बे द 8 0:७ ॑आ पक 0 पक कलद के कई): | आकर, | | | (कि द द | । ४ पृ० उ+--शु ० ५230 खपत | का 4022 रस ध०-सू ० बु० द ऊ: हक १ ११ पूछ द 8,224. 6.0| ९८५०) ०० कफ ६-० २००३ नल 4 उ० द अड अ कस रे० बु० | छ४ हक उठ 5४३ कक 0 आम क् + '+आल «के 5कल! उह कक के श० 6: के 5 758 2 आप 2 मा टक. 23720 23 2 अप 4अ ३३४० आअ०-मं० रा० 56%७३+ के ६४८०६ कट > कक मध्य 8 २६४०९३५३४६९०३४३३५० २०४३४ मिल किक - लिखे हि अाएले 5:50 5, , 557 55 &.)3. ... हु ३३. 77१0९ ०११ )032 ५5 मेशलिलक «८०० २४७४०२७३ १७५३ ४+०३५«५४४ ० है४० ०३१७ ०१५ ०२ ४०३५० कै. निकल हे. जनक कम || 227 ००: कीकफ फलज आअ० "१७४३३ ९ किन ०क -०० “7७८० ००० ००_१-2 2 ६२००२००३० 44 ४०३० 5०2 7 यश टू + श्र० लड़ 2922 ८८. ०४६० ४६०४००६६ बे नके 2० देन 5 पक नरक 4 कक. | आम अर अल । | . दस संख्यावाला अड्धू है। इसके दो भाग किये तो पाँच पाँच हुए। एक स्थान ज्येबे द द उंनपुंगर 5 परत + लत कि 7३ ब्का हैर- हे: . ० भ० हकाए जनपएफए कप १८ क22+: : “कामपट दब प 05% “घट केक | की कृ० रो० ३ ७०> २०० १०5२8 “केक ३० २०० *+ अहुऊ508 2 अल के98025 ६ 280 72% ५४ २०5३४ मृ० इस चक्र की छठी रेखा के एक छोर पर चित्रा नक्षत्र है। उसमें चन्द्रमा स्थित हैऔर दूसरे छोर पर शतभिष नक्षत्र है उसमें कोई भी ग्रह नहीं इस परस्पर वेध नहीं है। नहीं चन्द्रमा का किसी ग्रहर्बोंके साथ है । इस कारण 3 नें चित्रा नक्षत्र मेंयदि विवाह हो तो पूर्वोक्त दश योग दोष अशुभकारक हो सकता | इस दश योग का बाधक योग व्यासजी ने कहा है कि यदि हो विवाह लग्न शुक्र या बृहस्पति से दृष्ट वा युक्त हो तो दश योग नष्ट जाता हैं ॥ ७१॥ क् हू विवाहप्रकरण १३९ दक्षिण देशों में प्रसिद्ध बाणदोष लग्नेनाढ्या याततिथ्योड्धतष्टा: शषनागद्बयब्धितकन्दुसंख्ये । रोगो वह्नली राजचोरों च मृत्युर्बाणबचायं दाक्षिणात्यप्रसिद्ध: ॥। ७२॥ अन्वयः--याततिथ्य: लग्नेन आढ्या: अंकतष्टा: नागद्बबब्धितकेंन्दुसंख्ये शेषे (सति क्रमंण) रोग:, वह्निः, राजचौरो स्थात् (तथा) मृत्युबाण: स्यात्, चर अय॑ दाक्षिणात्यप्रसिद्ध: ।। ७२ ।। शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर जितनी तिथि बीत गई हों उनमें लग्न की राशि की संख्या को जोड़कर नव का भाग देने पर यदि आठ बाकी रहें तो रोगबाण, दो बाकी रहें तो अग्नि बाण, चार शेष रहें तो राजबाण, छ: शेष रहें तोचोरबाण और एक शेष रहे तो मृत्मुबाण दोष होता है। यह विवाहादि कार्यों में अशुभ होता प्रसिद्ध है। यह बाणदोष दक्षिण देश के लोगों में है।। ७२ ।। अन्य बाणदोष रसगुणशशिनागाब्ध्याब्चसंक्रान्तियातांदशकसमितिरथतष्टाडूयंदा पत्च शंषाः:। रुगनलनपचोरा मृत्युसंज्ञरच बाणो नवह॒तशरशेष शेषकक्ये संशल्यः: ॥ ७३॥ अन्वयः--रसगुणशशिनागाब्ध्याढ्यसंक्रान्तियातांशकमिति: अके: तष्टा यदा [यत्र ] पञच शेषाः: (तदा क्रमंण) रुगनलनृषचोरा: मृत्युसंज्ञ:च बाण: नवहंतशरशेष (सति) सशल्यः (स्यात्) ॥| ७३ ॥ (स्यात्), शेषकेक्ये सूर्य की स्पष्ट संक्रान्ति के भोगे हुए अंशों की संख्या को पाँच स्थान में रखकर क्रम से ६, ३, १, ८, ४ इन अंकों को जोड़कर उनमें नव का भाग देने से यदि पहिले स्थान में पाँच शेष रहें तो रोगबाण, दूसरे स्थान में पाँच शेष रहें तोअग्निबाण, तीसरे स्थान में पाँच शेष रहें तो राजबाण, चौथे स्थान में पाँच शेष रहें तो चोरबाण., पाँचवें स्थान में पाँच शेष रहें तो मृत्युवाण दोष होता है। उदाहरण--यथा सूरय्ये की स्पष्ट संक्रान्ति का एक अंश बीत गया है तो इस एक को पाँच स्थानों पर रखकर उनके नीचे क्रम से छः तीन, एक, आठ, चार ये अंक स्थापन किये और क्रम से सबको अलग-अलग जोड़ा तो सात, चार, दो, नव, पाँच ये अड्डू हुए । इनमें नव का भाग दिया तो पहिले में सात शेष, दूसरे में चार शेष, तीसरे में दो शेष, मुहत्तचिस्तामणि.._ १४० चौथे में शून्य शेष रहा । इस कारण क्रम से रोग, अग्नि, राज, चोर, ये चार बाण नहीं हुए, और पाँचवें स्थान में पाँच शेष रहे, इस कारण मृत्यु नाम का पाँचवाँ बाणदोष हुआ । इस रीति से कहे हुए बाण में काष्ठ का ही शल्य रहता है, इस कारण अति अशुभकारक नहीं होता । अब लोहे के शल्यवाला बाणदोष कहते हैं । पूर्व कहे हुए पाँचों स्थानों के शेषों के जोड़ में नव का भाग देने पर यदि पाँच शेष रहें तोवह लोहे के शल्यवाला बाणदोष होता है। यह अति अश्युभकारक होता है । उदाहरण-यथा ७ । ४ । २। ० । ५ इन पाँचों शेषों काजोड़ १८ हुआ । . इनमें ९ का भाग दिया तो शून्य शेष रहा । इस कारण अति अशुभकारक नहीं हुआ ॥ ७३ ॥। बाणदोष का परिहार राज्रौं चौररुजों दिवा नरपतिवंह्लिः सदा संध्ययोमत्युइचाथ दानौ नुपो विदि मृतिभौ मे5ग्निचौरो रवो । ब्रतगेहगोन पपसेवायानपाणिग्रहे रोगो5थ वर्ज्याइच ऋक्रमतो बुध रुगनलक्ष्मापालचोरा:- मृतिः ॥ ७४॥ अन्वयः--रात्रो चौररुजा (वर्ज्या), दिवा नरपति वह्लिः सदा (वज्यें:), च सन्ध्ययो: मृत्यु: (वज्यं:), अथ शन्ौ नुप:, विदि मृति:, भौमे अग्निचौरो, रवौ रोग: (वज्यं:) अथ ब्रतगरेहगोपनुपसेवायानपाणिग्रहे क्रमत: रुगनलक्ष्मापालचौ रा: मृतिश्च बुध: वर्ज्या: ॥ ७४ ॥। चोर और रोगबाण रात्रि में, राजबाण दिन में, अग्निबाण सब काल में और मृत्युबाण प्रातः: तथा सायद्छाल की संध्याओं में शुभ नहीं होता । शनैदचर में राजबाण, बुधवार में मृत्युबाण, मझ्भल में अग्नि और चोर- बाण, रविवार में रोगबाण वर्जनीय है । यज्ञोपवीत, घर का छवाना, राजा की सेवा अर्थात् नौकरी इत्यादि, सवारी करता और विवाह, इन पाँचों कार्यों मेंक्रम सेरोगबाण, अग्निबाण, -राजबाण, चोरबाण और मृत्युबाण त्यागना चाहिए, अर्थात् यज्ञोपवीत में रोगबाण, घर छवाने में अग्निबाण, राजा की सेवा में राजबाण, सवारी में चोरबाण और विवाह में मृत्युबाण त्यागना चाहिए ।। ७४ ।। ग्रहों की दृष्टि वध्याशं त्रिकोण चतुरस्रमस्तं पद्यन्ति खेटाइचरणाभिवृद्धचा । सन््दी गुरुभ सिसुतः परे च ऋमेण संपूर्णदृूशों भवन्ति ॥ ७५॥ अा|ह_्_्छॉॉगगगआआथआथआथओआथआथखथखखथ3वएखएगआओ।!/प।नककिििि नूर विवाहप्रकरण ि १४१ अन्वयः--त्याशं, त्रिकोणं, चतुरख्रं, अस्तं (सप्तमं )खेटा: चरणाभिवृद्धय्या पश्यन्ति, च [तथा] मनन््दः, ग्रुः भूमिसुतः, परे [रविचन्द्रबृधशुक्रा:| क्रमेण सम्पूर्णद्श: भवन्ति ॥ ७५ ॥। सब ग्रह अपने स्थान से तीसरे-दशवें, पाँचवें-नरवें, चौथे-आठवें और सातवें स्थान को पादवृद्धि से देखते हैं, अर्थात् तीसरे-दशवें स्थान को एक पाद अर्थात् चौथाई दृष्कटि से, पाँचवें-नवें स्थान को दो पाद - अर्थात् आधी दुष्टि से, चौथे-आठवें स्थान को तीन पाद अर्थात् पौन दृष्टि से और सातवें स्थान को चार पाद अर्थात् पूर्णदृष्टि से देखते हैं। अपने स्थान से तीसरेदशरवें स्थान को शनेइच र, पाँचवें-नवें स्थान को बृहस्पति, चौथे-आठवें स्थान को मंगल पूर्णदृष्टि से देखता है | ७५॥। लग्नस्थान को शद्धि यदा लग्नांशशो लवमथ तन् पश्यति युतों भवेद्वाष्य॑ बोढुः शुभफलमनल्पं॑ रचयति । लवद्यनस्वाभी लवम॒दनभं लग्नमदन प्रपश्येद्दा वध्वा: शुभमितरथा ज्ञेयमशु भम् ।। ७६॥। अन्वयः--यदा लग्नांशेश: लग्नं अथ (अथवा) तनु पश्यति वा युतों भवेत् (तदा) अय॑ वोढु: अनल्पं शुभफलं रचयति । यदि लवद्यूनस्वामी लवमदनभं लग्नमदनं वा प्रपश्येत (तदा) वध्वा: शुभ रचयति इतरथा अशुभ ज्ञेयम् ।। ७६ ॥। यदि विवाहकालिक लग्न से नवांश का स्वामी लग्न के नवांश को या लग्न को देखतां हो, अथवा नवांश या लग्न में स्थित हो तो वह वर को अति शुभ फल देता है। नवांश का उदाहरण--यथा मेष लग्न में मिथुन का नवांश हो, उसका स्वामी बुध तुला में स्थित होकर मिथुन के नवांश को देखता हो, अथवा उसी में स्थित हो । लग्न का- उदाहरण--यथा मेष लग्न में मिथुन के नवांश का स्वामी बुध, मकरराशि में स्थित होकर मिथुननवांश को नहीं देखता और मेष लग्न को देखता है या उसी में स्थित है । अब सातवें स्थान की शुद्धि कहते हैं। लग्न के नवांश से सातवें नवांश का स्वामी यदि लग्न से सातवें भाव के नवांश को या सातवें भाव को देखता हो या उसी में स्थित हो तो स्त्री को अति शुभ फल करता है। नवांश का उदाहरण--यथा मेष लग्न में मिथुन का नवांश है, उससे सातवें धनु के नवांश का स्वामी बृहस्पति, लग्न से सातवें तुला भाव में स्थित होकर धनु नवांश इओछड के १४२ मुह॒त्तचिन्तामणि मेष को देखता है या उसी में स्थित है। सातवें भाव का उदाहरण-नयथा लग्न में मियून का नवांश है । उससे सातवें धनु के नवांश का स्वामी बृहस्पति तुला कक में स्थित रहकर अपने नवांश को नहीं देखता और लग्न से सातवें विपरीत भाव को देखता है या उसी में स्थित हैं। इस कही हुई रीति से 3-+०->3>००>-.2०/आका नमक» करने अ% ने करके मीन सलऊ न जे कम» ५>भ»--कनमन--क न-क समान-"-धीननन+न जनके तत कलाकार जे की ख् केख्उ वी2: ४७ वेश "2233-+%05:7कि २५. जहा वि. दे4-८3. ८ < -++न«+नकं&--+3 3-८ नेम असम जरक७+ या भावों अशुभ होता हैं यदि पूर्वोक्त नवांशों के स्वामी पूर्बोक्त नवांशों को कन्या की मृत्यु कोन देखते होंऔर न उनमें स्थित हों तो वर और होती है | ७६ |! लग्न से सातवें भाव की शुद्धि । लवेशो लवं लग्नपो लग्नगेहं प्रपश्येन्मियो वा शुभ स्पाहरस्य ॥ ७७॥। लवडूनपों5शं द्युनं लग्नपो5स्त॑ सिथो वेक्षते स्याच्छुूभं कनन््यकाया: प्रपश्येत् (तदा) अन्वयः--लवेश: लवं, (तथा) लग्नयः लग्लगेहूं वामिथः (यदि ) मिथ: ईक्षते (तदा) कन्यकाया: वरस्य शुभ स्थात्। लवद्यूनपः अंश द्युनं लग्नवः अस्त वा श्भ स्यथात् ॥ ७७ |। को देखता हो नवांश का स्वामी नवांश को और लग्न का स्वांमी लग्न लग्न कोऔर लग्न अथवा दोनों परस्पर देखते हों, अर्थात् -नवांश का स्वामी और यदि लग्न के का स्वामी नवांश को देखता हो तो वर का शुभ होता है को और नवांश से सातवें नवांश का स्वामी लग्न से सातवें भाव के नवांश हो अथवा लग्न से सातवें भाव का स्वामी लग्न से सातवें भाव को देखता और भाव का दोनों परस्पर देखते हों, अर्थात् नवांश का स्वामी भाव को | ७७ ।। स्वामी नवांश को देखता हो तो कन्या का शुभ होता है अन्य प्रकार से लग्न और सातवें भाव की शुद्धि लवपतिशुभमित्र वीक्षतें$शं तनुं वा परिणयनकरस्य॒स्याच्छुभ शास्त्रदुष्टम् । मदनलवपमित्र॑ सौम्यमंशं झुनं वा तनुमदनगृहं चेद्दीक्षी शर्म वंध्वा ॥ ७८॥ अन्वयः--लवपतिशुभमित्रं अंश तनूं वा यदि वीक्षते तदा परिणयनकरस्य शास्त्रदुष्टं [तदा ] शुभ स्यात् । सौम्यं मदनलवपमित्न चेत अंश द्यूनं वा तनुमदनगुहं वीक्षते चेत् वध्वाः शर्म [शुभं |स्थात् ।। ७८।। लग्न के नवांश के स्वामी का मित्र होकर शुभग्रह, यदि नवांश को या लग्न को देंखता हो तो बर को शुभ होता है और लग्न के नवांश से सातवें दी जल की... सडक लक -औट के _अक कु क। क्रम ७७७ ३225 नन्-जल्ओ नल >> कु ननलुलक कक मीलशकी 2.3. “+. विवाहप्रकरण १४२ नवांश के स्वामी का मित्रहोकर शुभग्रह यदि लग्न से सातवें भाव के नवांश को या सातवें भाव को देखता हो तो स्त्री को शुभ होता है। ऐसा शास्त्र में कहा और देखा गया है ॥| ७८ ॥। सूर्य-संक्रान्ति में निषिद्धकाल विषुवायनेषु परपूर्वमध्यमान्ू._ दिवसांस्त्यजेदितरसंक्रमेष हि। घटिकास्तु षघोडशशु भक्रियाविधौ परतोषि पूर्वमपि सन्त्यजेदबुधः ॥ ७९॥ अन्वयः--विषुवायनेष् [संक्रान्तिषु | (क्रमेण) परपूर्वमध्यमान् दिवसान्' त्यजेत् । इतरसंक्रमेष हि परत: पूर्व अपि षोडश घटिका: शुभक्रियाविधो बुध: त्यजेत् ॥ ७८ ॥। विषुव अर्थात् तुला और मेष, अयन अर्थात् कर्क और मकर की संक्रान्ति जिस दिन हो वह दिन और उससे एक दिन आगे और पीछे, इन तीन दिनों में विवाहादि शुभ कार्य न करे । अन्य संक्रान्तियों में जिस समय संक्रान्ति हो उससे पहिले सोलह दण्ड और पीछे सोलह दण्ड त्याग दे अर्थात् इन बत्तीस दण्डों में विवाहादि शुभ कायें न करे ॥| ७९ ।| सूर्यादि ग्रहों की संक्रान्तियों में निषिद्धकाल देवहंच ड्रतंवो5ष्टाष्टो नाड्यो5ड्रूगः खन्पाः क्रमात् । वर्ज्या: संक्रमणे3र्कादे: प्रायो5क॑ स्पातिनिन्दिता: ॥| ८० ॥। अन्वयः--अर्कादे: संक्रमणे क्रमात् देवद्चंकतंव: अष्टाष्टो अंका: खनपा: नाड्च: वर्ज्या: । अकंस्य प्रायः अतिनिन्दिता: (भवन्ति ) ।| ८० ।। संक्रान्ति* काल से पूर्व और पर मिलाकर तेंतिस दण्ड सूर्य की संक्रान्ति में, तो दण्ड चन्द्रमा की संक्रान्ति में, नवदण्ड मंगल की संक्रान्ति में, छः दण्ड बुध की संक्रान्ति में, अट्ठासी दण्ड बृहस्पति की संक्रान्ति में, नव दण्ड शुक्र की संक्रान्ति में और एक सौ साठ दण्ड शनहचर की संक्रान्ति में निषिद्ध होते हैं, इसलिए विवाहादि शुभ कार्यों में त्यागने के योग्य हैं । किन्तु इनमें सूर्य की संक्रान्तिवाले तेंतिस दण्ड अति अशुभ होते हैं | ८० ॥ पंगु-अन्धादि लग्नदोष घौर्र तुलाली बधिरो मृगाइवो रात्रो च सिहाजवुषा दिवान्धाः । कन्यान॒युक्ककंटका निशान्धा दिने घटोःन्त्यो निशि पड्ग्गुसंज्ञ: ॥ ८१॥ अन्बयः--घस्रे [दिने] तुलाली बधिरो [भवेताम् |, रात्रौ मृगाश्वो वधिरौ #एक राशि से दूसरी राशि में ग्रहों केजाने को संक्रान्ति कहते हैं । १४४ मुहत्तचिन्तामणि (स्याताम्), च (तथा) सिहाजवृषा: दिवान्धा:, कन्यान्युक्क्रकटका: निशानन््धा: जी (भवन्ति), दिने घट:, निशि अन्त्य: पंगुसंज्ञ: स्थात् ॥| ८५१॥। तुला और वृहद्चिक ये दोनों लग्नें दिन में तथा मकर और धनु रात्रि में बहिरी होती हैं। सिह, मेष और वृष दिन में तथा कन्या, मिथुन और कर्क रात्रि में अन्धी होती हैं । कुम्भ लग्न दिन में तथा मीन लग्न रात्रि में पंगु होती हैं ।| ८१ ॥। *सतान््तर से पंगु आदि दोष बधिरा धन्वितुलालयो5पराह्ले मिथुनं ककंटकोड्रना निशान्धा: । दिवसान्धा हरिगोक्रियास्तु कुब्जा मृगकुम्भान्तिम भानि सन्ध्ययोहि ॥। ८२ ॥ अन्वय:--धन्वितुलालय: अपराह्लु बधिराः (स्यु:) मिथुनं ककेकट: अंगना (एत्ते) निशान्धा:, हरिगोक्रिया: दिवसान्धा: हि कुब्जा: (भवन्ति) ॥ ८२ ॥। (भवन्ति) तु पुनः मृगकुम्भान्तिमभानि सन्ध्ययो: धनु, तुला और वृश्चिक ये लग्नें दो पहर के बाद बहिरी होती हैं । मिथुन, कर्क और कन्या रात्रि में तथा सिंह, वृष और मेष दिन में अन्धी होती हैं। मकर, कुम्भ और मोन प्रात:काल तथा सायंकाल कुबड़ी होती हैं ॥ ८२ ।। पंग्वादि लग्नों काफल दारिद्र्॑ं बधिरतनौ दिवान्धलग्ने वधव्यं शिशुमरणं निशान्धलग्ने । पड-ग्वंगे नेखिलधनानि नाशमापुः सर्वत्राधिपगुरुदृष्टिभिन दोष: ॥ ८३॥। रतनौ (विवाहे) दारिद्रबं स्यात्, दिवान्धलग्ने वंधव्यम्, निशान्धअन्वयः--बधि लग्ने शिशुमरणम्, पर्वंगे निंखिलधनानि नाशं आपु: | सर्वत्र अधिपगुरुदृष्टिभि: न दोष: (स्यात् ) ॥| 5३ ॥। बहिरी लग्न में यदिं विवाह हो तों दारिद्रय होता है, जो लग्नें दिन में अन्धी कही हैं, उनमें यदि विवाह हो तो कन्या विधवा होती है, जो लगें रात्रि में अन्धी कही हैं उनमें विवाह हो तो सन््तान नहीं जीती और पंग्रुसंज्ञक लग्न में विवाह हो तो धन का नाश होता है। परन्तु यदि लग्न का स्वामी या बृहस्पति लग्न को देखता हो तो उक्त दोष नहीं होता ॥| ८३ ॥ . # यदह्यपि मतान््तर से ये पंग्वादि संज्ञाएँ ग्रन्थकार ने कहो हैं, परन्तु इसमें कोई प्रमाण नहीं मिलता । + हर 4८ हज विवाहप्रकरण शुभ नवांश कार्मुंकतोलिककन्यायुग्सलवे झषगे वा। यहि भवेदुपयामर्स्ताह सती खलु कन्या ॥ ८४ ॥ अन्वयः--कार्मुकतौलिककन्यायुूंग्मलवे वा झषगे (लवे) यहि उपयामः भवेत् तहि (सा) कन्या खलू् [निश्चयेन |सती (स्यथात्) ॥। 5४ ।। धनु, तुला, कन्या और मिथुन के नवांश में यदि विवाह हो तो कन्या पतिब्रता होती है । ग्रन्थकार ने मीन का नवांश भी विकल्प से शुभ बताया है, किन्तु प्राचीन मुनियों ने मीन का नवांश त्याज्य कहा है ॥। ८४॥। विहित नवांशों में भीकिसी का निषेध अन्त्यनवांशे न च परिणया काचन वर्गोत्तमसिह हिंत्वां । नो चरलग्ने चरलवयोगं तोलिसृगस्थे शहभति कुर्यात् ॥ ८५॥ अन्वयः--इह वर्गोत्तमं हित्वां अन्त्यनवांशे काचन (कन्या )न च परिणेया, तौलमृगस्थे शशिभूृति चरलग्ने चरलवयोगं नो कुर्यात् ॥ ८५५ ॥ वर्गोत्तम* नवांश को छोड़ लग्न के अन्त्य नवांश में विवाह न करना चाहिए । जैसे मेष लग्न में धन का नवांश और वृष लग्न में कन्या का नवांश इत्यादि ! तुला और मकर राशि में चन्द्रमा के रहते चर लग्न में चर नवांश का योग न करे, अर्थात् मेष, कर्क, तुला और मकर लग्न में नवांश का योग न करे, अर्थात् मेष, कक, तुला और मकर लग्न में इन्हीं के नवांश में विवाह न करे; क्योंकि ऐसे योग में ब्याही स्त्री पति को छोड़कर दूसरे पुरुष को ग्रहण करती है ।॥।| ८५५ ॥। सर्वथा लग्नभड़ः योग व्यये शनिः खेड्वनिजस्तृतीये भगुस्तनो चन्द्रखझला न शस्ताः। लग्नेटकविग्लोइव रिपौ मृतौ ग्लौलंग्नेट शुभाराइच मदे च सर्वे ॥ ८६॥। अन्वयः--शनिः व्यये, अवनिज: खे, भगृ: तृतीये, चन्द्रखला: तनों न शस्ता: । लग्नेट् कवि:, ग्लौं: रिपौ, च ग्लौ: लग्नेट शुभारा: मृतो, च (तथा) सर्वे [ग्रहा:] मदे [न शस्ताः स्यू: |॥| ८६॥ विवाहकालिक लग्न से बारहबें स्थान में शनेइचर, दशरवें स्थान में मंगल, तीसरे स्थान में शुक्र और लग्न में चन्द्रमा तथा पापग्रह शुभ नहीं होते । छठे कक] *अभीष्ट राशि में उसी का नवांश वर्गोत्तम कहा जाता है । यथा मेष राशि में मेष का नवांश, बृष राशि में वष का नवांश । १४६ मुहत्तंचिन्तामणि स्थान में लग्नेश, शुक्र और चन्द्रमा शुभ नहीं होते । आठवें स्थान में चन्द्रमा, लग्नेश, शुभग्रह और मंगल शुभ नहीं होते । और सातवें स्थान में सम्पूर्ण शुभाशुभ ग्रह शुभ नहीं होते ।| ८५६ ।। विधवाहकालिक शभग्रह त्यायाष्टघट्सु रविकेतुतमो5क पुत्रा- के हवा ८०७७ लक प काके +-->-->>-१५७३....आक >%-क-3+-०-.आभ. कपाकसक ण स्ज्यायारिग: छ्ितिसुतो द्विगुणायगोंडब्ज: । सप्तव्ययाष्टरहितो ज्ञगुरू सितोष्टत्रिद्यनघटव्ययग॒हान्परिहृत्य शस्तः ॥ ८७१ अन्वयः--ल्यायाष्टपट्सू रविकेतुतमो5कंपुत्रा: (शस्ताः स्यू:) । क्षितिसुतः त्यायारिग:, अब्ज: द्विगुणायग: (शुभः) । ज्ञग्रू सप्तव्ययाष्टरहितो (शुभो), अष्टत्रिद्युनषडव्ययगृहान् परिहत्य सितः शस्त: (स्यात्) ।। ८७ ॥। लग्न से तीसरे, गेरहवें, आठवें और छठे स्थान में सूर्य शुभ होता है । इन्हीं स्थानों में केतु, राहु और शनेश्चर भी शुभ होते हैं। तीसरे, गेरहवें, : छठे स्थान में मंगल शुभ होता है | दूसरे, तीसरे, गेरहवें स्थान में चन्द्रमा शुभ होता है। सातवें, बारहवें, आठवें स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों में बुध और बृहस्पति शुभ होते हैं। आठवें, तीसरे, सातवें, छठे, बारहवें स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों में शुक्र शुभ होता है ॥ ८५७॥ कतंरी आदि महादोषों का परिहार पापौ कतंरिकारकौ रिपुगहे नीचास्तगो कतंरीदोषो नव सितेषरिनीचगहगे तत्षष्ठदोषो5पि न । भौमे5स्ते रिपुनीचगे नहि भवे:्भौमो5ष्टमो दोषकृन्नीचे नीचनवांशके शशिनि रिष्फाष्टारिदोषोषपि न ॥ ८ठ८॥ अन्वय+--कतंरिका रकौ पापौ (यदि) रिपुगृहे (वा) नीचास्तगो (तदा) कतंरी- दोषो नैव (भवति), अरिनीचगुहंगे सिते तत्षष्ठदोष: अपि न (भवेत्), भौमे अस्ते रिपुनीचगे अष्टमों भौमः दोषकृत् नहि भव्रेतू, शशिनि नीचे नीचनवांशके (स्थिते) रिष्फाष्टारिदोष: अपि न भवेत् ।। ८८ ।। यदि कत॑री कारक दोनों ग्रह क्रर हों, अथवा अपने शत्रु के स्थान में स्थित हों या अपने नीच स्थान में हों, अथवा अस्त हों तो कतंरी दोष नहीं होता । यदि छुक्र अपने शत्रु के स्थान में या नीच स्थान में स्थित हो तो लग्न से छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता । यदि मंगलःअपने शत्रु के स्थान जज सिीयिसिसिशभीअभश/श शक ककककककककककककककी ककक्ककककीकि िकीककीककीकीकेक कु भभघभघभघभघभघफझझफै्््््््््््ऊ्ऱ १४७ विवाहप्रकरण न में यानीच स्थान में स्थित हो अथवा अस्त हो, तो लग्न से आठवें स्थान में रहकर भी दोषकारक नहीं होता । यदि चन्द्रमा अपने नीच स्थान में या नीच राशि के नवांश में स्थित हो तो लग्न से बारहवें, आठवें, छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता ॥| ८८ ॥। वर्ष आदि अनेक दोषों का परिहार अब्दायनतृतिथिमासभपक्षदग्धतिथ्यन्धकाणबधिरा ड्भमुखाइच दोषाः । नदयन्ति विद्गुरुसितेष्विह केन्द्रकोणे तद्रच्च पापविधुयुक्तनवांशदोषः ॥ ८९ ॥ अन्वयः--विद्गुरुसितेषु केन्द्रकोणे (स्थितेषु) इह अब्दायनर्तृतिथिमासभपक्षदग्धतिथ्यन्धकाणबधिरांगमुखा: दोषा: नश्यन्ति च पुनः तद्वत् पापविधुयुक्तनवांशदोष: ह नश्यति ॥ ८४ ।। लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें, दशवें स्थान में बुध, बृहस्पति और शुक्र के रहते सम-विषमादि वर्षदोष, अयनदोष, ऋतुदोष, रिक्तादि तिथिदोष, मासदोष, ऋरग्रहसहितादि नक्षत्रदोष, तेरह दिन का पक्षदोष, दग्धातिथिदोष अन्ध-काण-बधिरादि लग्नदोष और अकालवृष्टिट आदि दोष नष्ट हो जाते हैं। ऐसे ही चन्द्रयुक्त राशि के नवांश में पापग्रह के रहने का भी दोष नष्ट हो जाता है ॥ ८९१ अन्य दोषों का परिहार केन्द्रे कोणे जीव आये रवौ वां लग्ने चन्द्रे वापि वर्गोत्तमे वा । सर्घे दोषा नाशमायान्ति चन्द्रे लाभे तदृददुमुंह॒र्तांशदोषाः ॥ ९०॥ अन्बय:--जीवे केन्द्रे वाकोणे, वा रवौ आये, वा लगने वर्गोत्तमें, अपि वा चन्द्र ा: नर्गोत्तमे [स्थिते] सर्वे दोषा: नाशं आयान्ति, तद्बतू चन्द्रे लाभे (सति) दुर्मुहर्तांशदोष नाश आयान्ति ॥ 6० ।। लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें, दशवें स्थान में बृहस्पति, लग्न से गेरहवें स्थान सब में सूय॑ तथा लग्न के वर्गोत्तम में या अपने वर्गोत्तम में चन्द्रमा केरहते ा के रहते दोष नष्ट हो जाते हैं। ऐसे ही लग्न से गेरहवें स्थान में चन्द्रम दृष्टमुहत्तेदोष तथा पापग्रह के नवांश का दोष नष्ट हो जाता है ॥| ९० ॥। सामान्य दोषों का परिहार त्रिकोण केन्द्रे वामदनरहिते दोषशतक हरेत्सौम्यः शक्तों द्विगुणसपि लक्षे सुरगुरुः । डंआाआआांेआंआआ आाअछण,छं: श्ड८ मुह॒त्तंचिन्तामणि भवेदाये केन््द्रेड्भगप उत लबेशो यदि तदा समृहं दोषाणां दहन इव तूलं शमयति ॥ ९१॥ अन्वयः--सौम्य: त्रिकोणे वा मंदनरहिते केन्द्रे (स्थित:) दोषशतकक हरेत् । अपि शक्र: ढविगुणं, सुरुगुरु: लक्ष [लक्षगुणं ] दोषं हरेत् । अंगपः उत् लवेशः यदि आये वा केन्द्रे भवेत् तदा दोषाणां समूह दहनः तूलं इब शमयति ॥ ४१॥
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